ग्रीष्म संक्रांति, जिसे हिंदी में ‘ग्रीष्म संक्रांति’ या ‘सोल्स्टिस’ कहा जाता है, वर्ष की वह खगोलीय अवस्था है जब पृथ्वी की धुरी लगभग 23.5° के झुकाव पर होती है और सूर्य की सीधी किरणें कर्क रेखा (23.5° उत्तर अक्षांश) पर पड़ती हैं, जिससे उत्तरी गोलार्ध में दिन सबसे लंबा और रात सबसे छोटी होती है। 2025 की इस घटना शुक्रवार, 20 जून को स्थानीय समयानुसार रात 10:42 बजे (ET) यानी 21 जून को सुबह 02:42 UTC पर घटित हुई। इस मौके पर उत्तरी गोलार्ध के लगभग सभी हिस्सों में लगभग 15–16 घंटे तक प्रकाश रहता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में सबसे कम दिन और सबसे लम्बी रात होती है । हालांकि सूर्य की किरणें अब सबसे तीव्र होती हैं, फिर भी गर्मी का चरम अक्सर जुलाई–अगस्त में होता है, क्योंकि तापमान में देरी (seasonal lag) के कारण वातावरण को तेजी से गर्म होने में समय लगता है ।
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2025 में 15 जून को सूर्य मिथुन (Gemini) राशि में प्रवेश कर गया, जिससे त्रिग्रह योग (सूर्य–बुध–गुरु) और बुधादित्य, आदित्य राजयोग जैसे शक्तिशाली योग उत्पन्न हुए। इससे वृषभ, मिथुन, तुला, धनु और कुंभ राशियों को लाभ की सुविधा मिली ।
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22 जून से सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करेगा, जो भावनात्मक और बौद्धिक उतार-चढ़ाव ला सकता है ।
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वैज्ञानिक परिभाषा: ग्रीष्म संक्रांति वह क्षण है जब पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध सूर्य की तरफ अपनी अधिकतम झुकाव पर होता है, और सूर्य कर्क रेखा (Tropic of Cancer) के ठीक ऊपर स्थित होता है। इससे उत्तरी गोलार्ध में वह दिन सबसे लंबा बनता है और रात सबसे छोटी होती है।
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2025 की तिथि और समय: 20 जून, 2025 को रात 10:42 बजे UTC (यूरोपीय समयानुसार), जो कि भारत में 21 जून सुबह के समय के बराबर है।
राशियों पर विशेष प्रभाव
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20 जून को चंद्रमा रेवती नक्षत्र से मेष राशि में गोचर करेगा, जिससे मेष, मिथुन, कन्या और अन्य राशियों के जातकों को लाभदायक योग प्राप्त होंगे ।
सुझाए गए ज्योतिषीय उपाय
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संक्रांति पर सूर्य को अर्घ्य, गायत्री मंत्र जाप, देवी–देवताओं की पूजा, और दान करने से लाभ माना जाता है ।
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जैसे कन्या संक्रांति (17 sept, 2025) पर विश्वकर्मा की पूजा, गायत्री महामंत्र और गंगा स्नान विशेष शुभ समझे जाते हैं ।
ग्रीष्म संक्रांति का महत्त्व
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वैदिक/पौराणिक दृष्टि: यह सूर्य के कर्क रेखा के ऊपर जाने का समय है, जिसे प्रकृति के चक्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
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ऋतु परिवर्तन: इसके बाद दक्षिणायन शुरू होता है (16 जुलाई), जो देवताओं की ‘नोिद्रा’ काल माना गया है।
वैज्ञानिक-सामाजिक महत्व
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ऋतुओं की शुरुआत: यह खगोलीय गर्मी की शुरुआत का दिन होता है; बाद में मौसम की गर्मी बढ़ती है लेकिन तापमान में विलंब (seasonal lag) की वजह से जुलाई माह अक्सर और गर्म होता है ।
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प्रकाश की चरम स्थिति: ध्रुवों के नजदीक क्षेत्रों (जैसे आर्कटिक सर्कल) में दिन-रात में भिन्नता अत्यधिक होती है—रेटिकुलर नियमन के कारण यहाँ दिन कभी नहीं ढलता।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व
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भारत: योग दिवस (21 जून) ग्रीष्म संक्रांति के आसपास मनाया जाता है, जो शरीर, मन और आत्मा के संतुलन का प्रतीक है।
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वैश्विक उत्सव:
- मायन सभ्यता: चिचेन इट्ज़ा के पिरामिड में सूर्य की स्थिति के अनुसार प्रकाश और छाया के अद्भुत दृश्य उत्पन्न होते हैं।
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स्टोनहेंज (इंग्लैंड), चिचेन इत्ज़ा (मेक्सिको), बिगहॉर्न मेडिसिन व्हील (यूएस) जैसे प्राचीन स्थल संक्रांति के समय सूर्य की स्थिति के अनुसार बनाए गए हैं और आज भी उत्सवों का केंद्र हैं ।
- स्टोनहेंज (इंग्लैंड): इस ऐतिहासिक स्थल पर सूर्य की किरणें विशेष रूप से संक्रांति के दिन मुख्य पत्थरों के बीच से गुजरती हैं।
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यूरोप में मध्य ग्रीष्म पर जड़ी-बूटियों की पूजा, संगीत व नृत्य का आयोजन प्रचलित रहा है।
- मध्य ग्रीष्म जड़ी-बूटी व अनुष्ठान: सेल्टिक समुदाय (यूरोप) में मध्य ग्रीष्म पर जड़ी-बूटी इकट्ठा करना और उन्हें सूखाकर औषधि की तरह इस्तेमाल करना एक पुरानी परंपरा थी।
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आध्यात्मिक प्रथाएँ:
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पाइन इंडियन, स्कैंडिनेवियाई, रोमनों, मिस्रवासियों ने स्वागत, नवीनीकरण और सुख-समृद्धि के लिए विविध अनुष्ठान किए।
- प्राचीन मिस्र: नाइल नदी के जलस्तर की वृद्धि और नए वर्ष की शुरुआत से जुड़ा हुआ।
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कुछ स्थानों पर मेडिसिन व्हील के चारों ओर घूंघरू, धूप, मंत्र, नृत्य जैसे अनुष्ठान आज भी चल रहे हैं।
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संस्कृति और इतिहास में इसका अत्यधिक महत्व रहा है। प्राचीन समाजों ने स्टोनहेंज, गीजा और अन्य पिरामिडों को इस घटना के साथ संरेखित किया, जिसके चलते वे आज तक स्मारकों की भांति खड़े हैं । हिंदी भाषी क्षेत्रों में, इसे विशेष पूजा, सूर्यदेव अर्घ्य, ध्यान और प्रवचन के माध्यम से मनाया जाता है, और इसके ठीक अगले दिन अर्थात् 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाते हुए सकारात्मक ऊर्जा और आत्म-शक्ति का जश्न मनाया जाता है ।
1. ज्योतिषीय प्रभाव (Astrological Impact)
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उत्तरायण की शुरुआत: ग्रीष्म संक्रांति के समय सूर्य कर्क रेखा पर पहुंचकर उत्तरायण (उत्तर-दिशा की ओर गति) आरंभ करता है—यह छह माह का शुभ काल माना जाता है जब नए कार्य और बड़े निर्णय लिए जाते हैं।
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भावनात्मक और पारिवारिक ऊर्जा: सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है, जिसे चंद्र-नियंत्रित राशि माना जाता है—यह समय घर, माता और सुरक्षा से जुड़ा हुआ होता है; कुंडली में कर्क संबंधी घरों पर शुभ प्रभाव होता है।
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मौसम और कृषि पर असर: ज्योतिषीय मिदिनी पद्धति में यह सूर्य गोचर मानसूनी तैयारियों और कृषि के मौसम के संकेत देता है।
2. पूजा‑अनुष्ठान और दान‑पुण्य
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सूर्यदेव अर्घ्य: संक्रांति की सुबह स्नान के बाद उठकर उठते सूर्य को जल चढ़ाया जाता है। तांबे के लोटे में जल, चावल और फूल डालकर मंत्र “ऊँ रवये नमः” जप करके पूजा की जाती है।
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दान‑पुण्य: इस दिन अनाज, वस्त्र, जल और गाय सहित निम्न वस्तुओं का दान खास शुभ माना जाता है—यह पांडित्य और सामाजिक कल्याण का प्रतीक है।
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विशेष उपासना: आषाढ़ मास में गुरुवार को भगवान विष्णु के वामन रूप की विशेष पूजा-व्रत करने से संतान व आर्थिक लाभ की प्राप्ति होती है।
3. पंचांग और काल गणना
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आषाढ़ मास: 12 जून से 10 जुलाई तक आषाढ़ माह होता है—इस अवधि में सूर्य की पूजा (सूर्य अर्घ्य), गुरुवार व्रत और दिनभर का क्रमिक पालन शुभ माना जाता है।
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दक्षिणायण आरंभ: ग्रीष्म संक्रांति से शुरू होकर, यह दक्षिणायण की शुरुआत होती है—जिसमें चातुर्मास जैसा धार्मिक अवधि शामिल होता है, जहाँ वैष्णव परंपरा में विशेष संयम और साधना का विधान है।
4. सांस्कृतिक और संयमी जीवनशैली
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कुण्डली में योग‑दोष शुद्धि: संक्रांति काल में ग्रहदोष (जैसे मंगल दोष) दूर करने के लिए संबंधित वृक्षों की पूजा व दान विधि अपना सकते हैं ।
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संयम व आहार नियम: पंचांग अनुसार अमावस्या, एकादशी, चातुर्मास आदि काल में रोटी बनाने में परहेज़ और फलाहार-दान आदि बनाए रखना उत्तम शुभ माना जाता है।
ग्रीष्म संक्रांति सिर्फ दिन-रात का बदल होना नहीं है, बल्कि यह ज्योतिषीय रूप से कर्म, साधना और आत्मिक उन्नति का आरंभ दर्शाती है। इस दिन सूर्य उपासना, अर्घ्य, व्रत और दान-पुण्य से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। पंचांग के अनुसार स्नान, सूर्यपूजा, गुरुवार व्रत, और चातुर्मास संयम का यह समुचित समय है। भारत में स्थानीय पर्व जैसे छठ, मकर‑संक्रांति और कर्क‑संक्रांति भी इसी प्राकृतिक चक्र में जुड़े हुए हैं।
भारत में महत्त्व और परंपराएँ
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वैदिक संदर्भ: ग्रीष्म संक्रांति को सूर्य की ऊर्ध्व-ऊर्जा का समय माना गया है—इस दौरान सूर्य नमस्कार, सूर्य अर्घ्य और आध्यात्मिक ध्यान का विशेष महत्व है।
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योग दिवस: ग्रीष्म संक्रांति के बाद 21 जून को योग दिवस मनाया जाता है—इसका उद्देश्य सूर्य ऊर्जा और मानव ऊर्जा के बीच संतुलन है ।
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ज्योतिषीय दृष्टि:
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सूर्य का कर्क रेखा पर आना कई राशियों के लिए शुभ योग बनाता है।
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इस दिन सूर्य अर्घ्य, मंत्र जाप और दान करना अत्यंत फलदायक माना जाता है।
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वैज्ञानिक दृष्टि से, इस दिन सूर्य आकाश में सबसे ऊँचा दिखाई देता है, और स्थानीय ध्रुवीय छायाएँ अपनी सबसे छोटी लंबाई तक पहुँच जाती हैं। इसके बाद सूर्य की सीधी किरणें धीरे-धीरे दक्षिण की ओर लौटने लगती हैं और धीरे-धीरे दिन घटने लगता है ।
ग्रीष्म संक्रांति न केवल खगोलीय घटना है, बल्कि यह मानव जीवन, संस्कृति, मौसम और आध्यात्मिकता के बीच एक गहरे संबंध का प्रतीक भी है, जो हमें प्रकाश, ऊर्जा और संतुलन की ओर प्रेरित करता है।