कल, 4 अक्टूबर 2025, शनिवार को आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि है, जिस दिन शनि प्रदोष व्रत मनाया जाएगा। यह व्रत विशेष रूप से भगवान शिव की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन द्विपुष्कर योग और शनि प्रदोष व्रत का संयोग बन रहा है, जो पूजा के प्रभाव को और भी अधिक सशक्त बनाता है।प्रदोष व्रत की कथा हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, जो विशेष रूप से भगवान शिव की उपासना से जुड़ी हुई है। यह व्रत प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है, जो भगवान शिव की पूजा के लिए विशेष रूप से उपयुक्त मानी जाती है। शनि प्रदोष व्रत विशेष रूप से शनि ग्रह से संबंधित दोषों को शांत करने के लिए किया जाता है। इस दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि, और शांति की प्राप्ति होती है। साथ ही, यह व्रत मानसिक अशांति, चंद्र दोष, मृत्यु के समय भय, और यमदंड से मुक्ति दिलाने में सहायक माना जाता है।
शुभ मुहूर्त और पूजा समय
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प्रदोष काल: शाम 6:03 बजे से रात 8:30 बजे तक।
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सूर्यास्त: शाम 6:03 बजे।
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चंद्रोदय: शाम 4:21 बजे।
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चंद्रास्त: सुबह 4:03 बजे।
इस समय में पूजा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत में उपवास, रात्रि जागरण और शिवलिंग का अभिषेक करना अत्यंत फलदायक माना जाता है। प्रदोष व्रत की पूजा शाम के समय होती है, जिसे प्रदोष काल कहा जाता है। यह समय सूर्यास्त के बाद और रात्रि के आगमन से पूर्व का होता है। इस समय में पूजा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
पूजा विधि
- स्नान और व्रत का संकल्प: प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। फिर व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थल की तैयारी: घर के मंदिर या पूजा स्थल को स्वच्छ करें। एक चौकी पर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की मूर्तियों या चित्रों की स्थापना करें।
- भगवान गणेश की पूजा: सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें, क्योंकि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश पूजा से होती है।
- शिवलिंग का अभिषेक: शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और गन्ने का रस मिलाकर अभिषेक करें। इसके बाद बेलपत्र, आक के फूल, धतूरा, भांग, चंदन, काले तिल और अक्षत (चावल) अर्पित करें।
- भोग अर्पित करना: भगवान शिव को खीर, हलवा, फल, मिठाइयाँ, ठंडई या लस्सी जैसी सात्विक चीजों का भोग अर्पित करें।
- मंत्र जाप और स्तोत्र पाठ: ‘ॐ नमः शिवाय‘ मंत्र का जाप करें। साथ ही शिव चालीसा, शिव रक्षा स्तोत्र या शनि स्तोत्र का पाठ करें।
- आरती और प्रदोष कथा: पूजा के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें। फिर शनि प्रदोष व्रत की कथा सुनें या पढ़ें।
- शनि देव की पूजा: शिव पूजा के बाद शनि देव की पूजा करें। शनि देव को सरसों के तेल का दीपक अर्पित करें और ‘ॐ शनैश्चराय नमः‘ मंत्र का जाप करें।
- दान और पारण: पूजा के बाद दान-पुण्य करें। शनिदेव से संबंधित वस्तुएं जैसे काले तिल, उड़द की दाल, काले कपड़े और लोहे की वस्तुएं दान करें। अगले दिन व्रत का पारण करें।
पूजा सामग्री
- गंगाजल
- बेलपत्र
- आक के फूल
- धतूरा
- भांग
- चंदन
- काले तिल
- अक्षत (चावल)
- फल, फूल, मिठाइयाँ
- घी का दीपक
- धूप और अगरबत्ती
- सरसों का तेल (शनि पूजा के लिए)
- काले तिल, उड़द की दाल, काले कपड़े, लोहे की वस्तुएं (दान के लिए)
इस पूजा विधि का पालन करने से शनि दोषों का निवारण होता है और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत संतान सुख, मानसिक शांति और पारिवारिक सुखों के लिए भी किया जाता है।
प्रदोष व्रत की कथा
प्राचीनकाल में एक नगर में एक ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ भिक्षाटन करके अपना जीवन यापन करती थी। एक दिन जब वह घर लौट रही थी, तो उसे एक घायल राजकुमार मिला। ब्राह्मणी ने उसे अपने घर ले जाकर उसकी देखभाल की। कुछ समय बाद, राजकुमार ने ब्राह्मणी की पुत्री से विवाह किया और उसके साथ सुखमय जीवन बिताया। इस घटना के बाद ब्राह्मणी ने प्रदोष व्रत करना शुरू किया। उसके व्रत के प्रभाव से राजकुमार का खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हुआ और वह सुख-शांति से रहने लगा।
शनि प्रदोष व्रत की कथा
शनि प्रदोष व्रत की कथा में एक नगर के सेठ और सेठानी का उल्लेख है, जो संतान सुख के लिए परेशान थे। एक दिन वे तीर्थ यात्रा पर निकले और मार्ग में एक साधु से मिले। साधु ने उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। सेठ और सेठानी ने विधिपूर्वक व्रत किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें संतान सुख की प्राप्ति हुई। इस कथा से यह सिद्ध होता है कि शनि प्रदोष व्रत से शनि दोषों का निवारण होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
इस प्रकार, प्रदोष व्रत की कथा हमें भगवान शिव की उपासना और व्रत के महत्व को समझाती है। इस व्रत को श्रद्धा और विश्वास के साथ करने से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है।