भगवान विष्णु को समर्पित षटतिला एकादशी जब तिल का उपयोग छः प्रकार से करके भक्ति, सेवा, दान और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दृढ़ता से अपनाया जाता है

षटतिला एकादशी

षटतिला एकादशी हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र व्रत और पर्व है, जो भगवान विष्णु को समर्पित होता है। यह माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि में पड़ता है और इस वर्ष 14 जनवरी 2026, बुधवार को मनाया जाएगा, जब एकादशी तिथि सुबह के समय प्रभाव में रहेगी। एकादशी तिथि 13 जनवरी दोपहर 3:17 बजे से शुरू होकर 14 जनवरी शाम 5:52 बजे तक रहेगी और पारण (व्रत खोलने का शुभ समय) 15 जनवरी सुबह 7:15 से 9:21 तक माना गया है। यह वर्ष खास इसलिए भी है क्योंकि 23 साल बाद षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति एक ही दिन पड़ रहे हैं, जिससे धार्मिक विद्वानों के अनुसार इस दिन के पुण्य और दान‑धर्म का फल सामान्य से कहीं अधिक प्राप्त होता है। षटतिला शब्द का अर्थ है “षट्” (छह) और “तिल”  इसलिए इस व्रत में तिल के छह विशेष प्रयोगों का महत्व है। इन प्रयोगों में तिल के साथ स्नान, तिल का लेप, तिल का भोग/आहार, तिल का हवन, तिल का दान और तिल से तर्पण जैसे अनुष्ठान शामिल हैं, जो शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करने तथा पापों के नाश और आशीर्वाद पाने के लिए किए जाते हैं। इस दिन भक्त अक्सर ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान, तुलसी पूजा, विशेष भोज एवं साधना करते हैं और दिनभर व्रत का पालन करते हैं।

इस दिन व्रती व्रत की भक्ति एवं संकल्प पूर्ण रूप से रखते हैं और तिल के छह प्रकार के उपयोग से भगवान का स्मरण करते हैं — तिल से स्नान करना, तिल का लेप, तिल से हवन/पूजा, तिल जल तर्पण, तिल युक्त भोजन और तिल दान करना, इसी कारण इसे षट‑तिला कहा जाता है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पहले स्नान कर शरीर को शुद्ध करें, संभव हो तो तिल मिला हुआ जल उपयोग में लें और फिर साफ‑सुथरे वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर तुलसी के पत्तों, फूल, फल और भोग (विशेषकर तिल‑गुड़) अर्पित करें। पूजा आरंभ में संकल्प लें कि आप आज भगवान विष्णु की कृपा पाने हेतु षटतिला एकादशी का व्रत कर रहे हैं और तिल के छह प्रयोग करेंगे। मंत्र जाप भी महत्वपूर्ण है; साधक 108 बार ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या भगवान विष्णु के अन्य मंत्रों का जाप कर सकते हैं। दिनभर निर्जला या फलाहारी व्रत रखते हुए भजन‑कीर्तन, विष्णु सहस्रनाम पाठ और शास्त्रोक्त कथा का श्रवण करना शुभ माना जाता है। शाम को दान‑धर्म में तिल, वस्त्र, अन्न या अन्य वस्तुओं का दान करना चाहिए, जिससे पाप नाश, धन‑समृद्धि और शांति की प्राप्ति होती है। अगले दिन द्वादशी (15 जनवरी 2026) को शुभ मुहूर्त में व्रत पारण (व्रत तोड़ना) करें।

प्राचीन समय में भगवान श्रीकृष्ण, नारद मुनि और अन्य ऋषियों‑मुनियों के बीच एक संवाद हुआ, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने माघ मास की षटतिला एकादशी का महात्म्य और इसकी कथा सुनाई। इस कथा के अनुसार एक ऋषि‑महर्षि और ब्राह्मणी का उल्लेख मिलता है जिनके बीच यह कथा घटित हुई। एक बार दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा कि मनुष्य जीवन में पापों का नाश और मुक्ति का मार्ग क्या है। ऋषि ने कहा कि माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी पर विशेष नियमों का पालन करने तथा तिल के छः प्रकार के प्रयोग से ब्रह्म‑शुद्धि, पापमोचन और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

कहा जाता है कि एक समय एक ब्राह्मणी व्रत‑उपासना करने में अत्यंत निष्ठावान थी, परन्तु दान‑धर्म विशेष रूप से तिल का दान नहीं करती थी। उसने केवल पूजा‑अर्चना और उपवास किए, लेकिन अन्न‑दान नहीं किया। जब वह परलोक में पहुँचती है तो पाता है कि उसका गृहस्थ जीवन बिल्कुल भी समृद्ध नहीं है। उसने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि उसे इसका कारण बताएं। तब भगवान विष्णु ने उसे षटतिला एकादशी व्रत और तिल‑दान का महत्त्व समझाया। ब्राह्मणी ने जैसे‑तैसे इस व्रत को विधिवत रखा और तिल के छः विभिन्न प्रकार से उपयोग किए, जैसे तिल से स्नान करना, तिल‑उबटन, हवन, तिल‑युक्त भोजन और तिल‑दान। इससे उसके पाप नष्ट हुए, घर में अन्न‑धन की वृद्धि हुई और उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।

कथा का मुख्य संदेश यह है कि केवल उपवास या पूजा ही पर्याप्त नहीं होती; दान‑धर्म, विशेषतः तिल का दान, सामाजिक सेवा और शुद्ध आचरण से ही जीवन में शांति, समृद्धि और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। यही कारण है कि षटतिला एकादशी को तिल के छः उपयोग के साथ रखना शुभ‑फलदायी माना गया है; जिससे मनुष्य पापों से मुक्ति पाता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है। इस व्रत कथा से यह शिक्षा मिलती है कि केवल पूजा‑उपासना करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि दान‑पुण्य, समाज सेवा और तिल से संबंधित षट‑कर्मों का पालन करने से ही जीवन में सुख‑समृद्धि, पाप मोचन और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

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