द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत का महात्म्य बहुत विशेष माना जाता है। इस व्रत को भगवान गणेश के प्रति भक्ति, श्रद्धा और संकल्प के रूप में रखा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो भक्त संकष्टी चतुर्थी व्रत विधिपूर्वक रखते हैं और गणेश जी की पूजा करते हैं, उन्हें जीवन में आने वाले सभी संकट, बाधा और दुर्भाग्य दूर हो जाते हैं। साथ ही यह व्रत मन, धन और स्वास्थ्य की शुद्धि करता है और व्यक्ति के घर में शांति, समृद्धि और सुख-सम्पन्नता लाता है। पुराणों में उल्लेख है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय है, और इसे करने वाले भक्तों पर भगवान गणेश विशेष कृपा करते हैं। कहा जाता है कि यह व्रत बुद्धि, धैर्य और सफलता प्रदान करता है और जीवन में आने वाली कठिनाइयों को सहजता से पार करने की शक्ति देता है। इसलिए इस व्रत को श्रद्धा, संयम और नियमितता के साथ करने का महत्व अत्यधिक है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूजा विधि इस प्रकार है; व्रती प्रातः जल्दी उठकर स्नान करके साफ वस्त्र पहनते हैं और पूजा स्थल को स्वच्छ कर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाते हैं। उसके बाद गणेश जी की मूर्ति या चित्र स्थापित कर दीपक और अगरबत्ती जलाते हैं। मन को शांत करके व्रत का संकल्प लिया जाता है कि आज से श्रद्धा और अनुशासन के साथ यह व्रत रखा जाएगा। पूजा में दूर्वा, लाल फूल, दूध, अक्षत, हलवा, मोदक या फल आदि भगवान गणेश को भोग के रूप में अर्पित किए जाते हैं। इस दिन व्रती फलाहारी या निर्जल व्रत रखते हैं और अनाज, मांस, शराब आदि का सेवन नहीं करते। पूजा के दौरान मुख्य रूप से मंत्र ॐ गं गणपतये नमः का जप 108 बार किया जाता है, साथ ही गणेश चालीसा या संकष्टी चतुर्थी कथा का पाठ भी किया जा सकता है। चतुर्थी तिथि के चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण किया जाता है। इस व्रत को श्रद्धा और पूर्ण भक्ति के साथ करने से व्यक्ति के जीवन में संकट दूर होते हैं, बुद्धि और विवेक बढ़ते हैं, तथा घर में शांति और समृद्धि आती है। संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के भक्त सूर्योदय से चंद्र दर्शन तक कठोर व्रत रखते हैं। इस व्रत में भगवान गणेश के भक्त केवल फल और भूमिगत उगने वाले पौधों या जड़ों का ही सेवन करते हैं। इसलिए साबूदाना खिचड़ी, आलू, मूंगफली आदि को इस व्रत में उपयुक्त आहार माना जाता है। द्विप्रहरी संकष्टी चतुर्थी का व्रत केवल चंद्र दर्शन के बाद ही समाप्त किया जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, भारत के उत्तरी हिस्सों में माघ माह की संकष्टी चतुर्थी को विशेष आनंद और श्रद्धा के साथ सकट चौथ के रूप में मनाया जाता है।
सत्य युग में युवानश्व नामक एक राजा राज्य करता था। उसके दरबार में विष्णु शर्मा नामक एक ब्राह्मण रहते थे, जो सभी शास्त्रों में निपुण और ज्ञानी थे। विष्णु शर्मा के सात पुत्र और सात पुत्रवधू थीं। समय के साथ, विष्णु शर्मा वृद्ध हो गए और उनकी उम्र के कारण स्वास्थ्य भी कमजोर पड़ने लगा। वृद्धावस्था के कारण उनकी छह पुत्रवधुओं ने उन्हें एक-एक करके त्याग दिया, लेकिन सातवीं और सबसे छोटी पुत्रवधू ने अपने ससुर की सेवा पूरी निष्ठा और भक्ति के साथ करना शुरू किया।
विष्णु शर्मा अत्यंत ज्ञानी और संत पुरुष थे। अपनी पुत्रवधू की सेवा से संतुष्ट होकर उन्होंने उसे संकष्टी चतुर्थी व्रत के बारे में बताया और इसे करने की सलाह दी। अपने ससुर के निर्देशानुसार, छोटी पुत्रवधू ने द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ किया। इस व्रत के फलस्वरूप, उसने संपूर्ण सुख-सुविधाओं और सुखमय जीवन का आनंद प्राप्त किया और अंततः मोक्ष प्राप्त किया। इसलिए, भगवान गणेश की विशेष कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।