आमलकी एकादशी पर जानें व्रत की चमत्कारी महिमा पूजा विधि और पापों से मुक्ति का रहस्य

आमलकी एकादशी

आमलकी एकादशी अत्यंत पुण्य और धार्मिक महत्व वाला व्रत है, जो भगवान विष्णु को समर्पित होता है। यह एकादशी फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी होती है, अर्थात् चन्द्रमा के बढ़ते चक्र की 11वीं तिथि पर पड़ने वाला व्रत। इसे आमलकी एकादशी, आमला इकादशी, रंगभरी एकादशी तथा पापनाशिनी एकादशी के नामों से भी जाना जाता है। इस दिन आंवले (आमलकी/भारतीय गूसबेरी) के वृक्ष का विशेष पूजन किया जाता है क्योंकि इसे भगवान विष्णु का रूप या माता लक्ष्मी का निवास स्थान माना जाता है; इसके फल और वृक्ष दोनों को धार्मिक रूप से अत्यंत पवित्र मानकर पूजा-अर्चना की जाती है। आमलकी एकादशी का पूजा-विधि और व्रत कथा हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित है और ऐसा विश्वास है कि इस व्रत से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं, जीवन में सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति होती है तथा भगवान विष्णु की अनुकम्पा प्राप्त होती है। यह व्रत मोक्ष, वैराग्य और भक्ति की भावना से जुड़ा माना जाता है और भक्त श्रद्धा से पूर्ण उपवास रखते हैं, प्रभु का ध्यान करते हैं तथा धार्मिक कर्मों जैसे दान-पुण्य, विष्णु मंत्रों का जप और पवित्र जीवनशैली का अभ्यास करते हैं।

इस वर्ष आमलकी एकादशी का व्रत 27 फरवरी 2026 (शुक्रवार) को रखा जाएगा। एकादशी तिथि रात 12:33 बजे से प्रारंभ होकर उसी दिन 10:32 बजे रात तक रहेगी, और उसके बाद अगले दिन 28 फरवरी 2026 को सुबह 6:47 बजे से 9:06 बजे तक पारण (व्रत तोड़ने) का शुभ समय रहेगा। भक्तगण इस दिन प्रातः शुद्ध स्नान करके घर को स्वच्छ रखते हैं, भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने दीप, धूप, पुष्प, फल, विशिष्ट मंत्र और भक्ति के साथ पूजा करते हैं, तथा आमलकी के वृक्ष की पूजा कर उसके फल चढ़ाते हैं। इस व्रत के दौरान दैनिक भोजन में अनाज, दालें और कुछ विशिष्ट वस्तुएँ परहेज़ की जाती हैं; कुछ लोग पूर्ण उपवास रखते हैं जबकि अन्य फलों और दूध-दही जैसे हलके आहार लेते हैं। इस व्रत को करने से मानसिक शांति, पापों का नाश, और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि होती है, और पारायण के पश्चात फल-फूल तथा अन्न का दान भी पुण्यकारी माना जाता है।

आमलकी एकादशी की पूजा विधि प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने से शुरू होती है। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर घर के पूजा स्थान या मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा में दीपक जलाएं, धूप-अगरबत्ती अर्पित करें और पीले फूल, तुलसी दल, फल तथा नैवेद्य चढ़ाएं। इस दिन विशेष रूप से आंवले (आमलकी) के वृक्ष की पूजा का महत्व है, इसलिए यदि संभव हो तो आंवले के पेड़ के पास जाकर जल, रोली, चावल, फूल और धूप अर्पित करें तथा वृक्ष की परिक्रमा करें। भगवान विष्णु के मंत्रों जैसे “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और एकादशी व्रत कथा का पाठ सुनें या पढ़ें। दिनभर उपवास रखें, कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं, जबकि अन्य फलाहार ग्रहण करते हैं। द्वादशी तिथि में शुभ मुहूर्त में पारण कर व्रत खोलें तथा ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या आंवले का दान करें। श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई यह पूजा पापों के नाश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति देने वाली मानी जाती है।

प्राचीन काल में वैदिशा नामक नगर में चित्ररथ नाम का एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। वह भगवान विष्णु का परम भक्त था और उसके राज्य के सभी लोग भी धर्म-कर्म में विश्वास रखते थे। फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन राजा और प्रजा ने मिलकर आमलकी एकादशी का व्रत रखा। सभी लोग आंवले के वृक्ष के नीचे एकत्र हुए, उसकी विधि-पूर्वक पूजा की, दीप जलाए और भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन किया। उसी नगर में एक शिकारी रहता था, जो जीव हिंसा करके अपना जीवन यापन करता था। वह संयोगवश उस दिन भूखा-प्यासा भटकते हुए पूजा स्थल पर पहुंच गया। वहां उसने भक्तों के साथ बैठकर भगवान का नाम सुना और रातभर जागरण में उपस्थित रहा। उसने स्वयं व्रत का संकल्प तो नहीं लिया था, परंतु अनजाने में ही उसने उपवास और भगवान का स्मरण कर लिया। समय आने पर उस शिकारी की मृत्यु हुई। आमलकी एकादशी के प्रभाव से उसे अगले जन्म में एक श्रेष्ठ और तेजस्वी राजा के रूप में जन्म मिला। एक बार शत्रुओं ने उस पर आक्रमण किया, तब भगवान विष्णु की कृपा से दिव्य शक्ति प्रकट हुई और उसकी रक्षा की। तब उसे स्मरण हुआ कि पूर्व जन्म में अनजाने में किए गए आमलकी एकादशी व्रत के कारण उसे यह पुण्य प्राप्त हुआ है। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि श्रद्धा से या अनजाने में भी किया गया यह व्रत अत्यंत पुण्यदायक होता है। आमलकी एकादशी का व्रत करने से पापों का नाश, सुख-समृद्धि की प्राप्ति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

आमलकी एकादशी के दिन कुछ कार्यों से विशेष रूप से बचना चाहिए ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। इस दिन चावल, गेहूं, दाल, अनाज और तामसिक भोजन जैसे मांस, मछली, अंडा, लहसुन और प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। शराब और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से दूर रहना चाहिए। क्रोध, झूठ बोलना, अपशब्द कहना, चुगली करना और किसी का अपमान करना भी वर्जित माना जाता है। इस दिन बाल-नाखून काटना, दाढ़ी बनवाना और अत्यधिक आलस्य करना उचित नहीं माना जाता। व्रत रखने वाले व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और मन को शुद्ध तथा शांत रखना चाहिए। आंवले के वृक्ष को बिना कारण हानि पहुंचाना या उसकी टहनियां तोड़ना भी अशुभ माना जाता है। इस प्रकार संयम, सादगी और भक्ति के साथ दिन व्यतीत करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

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