वट सावित्री व्रत विवाहित महिलाओं द्वारा रखा जाने वाला अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। यह व्रत पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भी मनाने की परंपरा है। वट सावित्री व्रत 16 मई को मनाया जाएगा और इस दिन देशभर में महिलाएं बरगद के वृक्ष यानी वट वृक्ष की पूजा करेंगी। शास्त्रों में वट वृक्ष को त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना गया है, इसलिए इसकी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस व्रत का संबंध पौराणिक कथा सावित्री और सत्यवान से जुड़ा हुआ है। कथा के अनुसार सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे। अपनी बुद्धिमत्ता, पतिव्रता धर्म, तप और अटूट संकल्प के बल पर सावित्री ने मृत्यु के देवता यमराज को भी विवश कर दिया था। तभी से यह व्रत पति की दीर्घायु और वैवाहिक सुख के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि जो महिलाएं श्रद्धा और विधि-विधान से यह व्रत रखती हैं, उनके पति को लंबी आयु और परिवार को सुख-शांति प्राप्त होती है। इस पर्व का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी बहुत बड़ा है। गांवों और शहरों में महिलाएं समूह बनाकर पूजा करती हैं, भजन-कीर्तन गाती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। यह व्रत केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि वैवाहिक रिश्तों में प्रेम, विश्वास, समर्पण और परिवार की एकता का संदेश भी देता है। वर्तमान समय में भी वट सावित्री व्रत को लेकर महिलाओं में गहरी श्रद्धा देखने को मिलती है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार वट सावित्री व्रत का आध्यात्मिक संदेश यह है कि सच्चा प्रेम, समर्पण और धैर्य किसी भी कठिन परिस्थिति को जीत सकता है। यही कारण है कि यह व्रत भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में नारी शक्ति, पतिव्रता धर्म और अटूट विश्वास का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करती हैं और साफ-सुथरे या नए वस्त्र धारण करती हैं। सुहागिन महिलाएं विशेष रूप से लाल, पीले या हरे रंग के कपड़े पहनती हैं तथा सोलह श्रृंगार करती हैं। इसके बाद घर के मंदिर में दीपक जलाकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। कई महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुछ फलाहार ग्रहण करके पूजा करती हैं। पूजा के लिए एक थाली में रोली, चावल, हल्दी, कुमकुम, फूल, भीगे हुए चने, फल, मिठाई, धूप, दीप, जल से भरा कलश और कच्चा सूत रखा जाता है। इसके बाद महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ के पास जाती हैं। पेड़ की जड़ में जल अर्पित किया जाता है और रोली-चावल चढ़ाए जाते हैं। फिर वट वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूत या धागा लपेटते हुए सात या 108 बार परिक्रमा की जाती है। परिक्रमा करते समय महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करती हैं। पूजा के दौरान सावित्री-सत्यवान की कथा सुनना और पढ़ना अत्यंत शुभ माना जाता है। महिलाएं माता सावित्री और सत्यवान की तस्वीर या प्रतिमा की पूजा करती हैं तथा धूप-दीप दिखाकर आरती करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में भजन-कीर्तन भी करती हैं। पूजा समाप्त होने के बाद सुहाग की सामग्री जैसे चूड़ी, बिंदी, सिंदूर आदि का आदान-प्रदान किया जाता है और बुजुर्ग महिलाओं का आशीर्वाद लिया जाता है। व्रत का पारण सामान्यतः कथा और पूजा समाप्त होने के बाद किया जाता है। इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व होता है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और दक्षिणा देने से पुण्य फल प्राप्त होने की मान्यता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और नियमपूर्वक वट सावित्री व्रत करने से वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है, पति की आयु लंबी होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
वट सावित्री व्रत दो प्रमुख तिथियों पर मनाया जाता है; ज्येष्ठ अमावस्या और कुछ क्षेत्रों में ज्येष्ठ पूर्णिमा। दोनों ही रूपों में यह व्रत विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है, लेकिन क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार इसकी तिथि और विधि में थोड़ा अंतर देखने को मिलता है। वट सावित्री अमावस्या सबसे अधिक प्रचलित परंपरा है, जो ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य भारत में यही रूप अधिक प्रचलित है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष (बरगद के पेड़) की पूजा करती हैं, उसकी जड़ों में जल अर्पित करती हैं, कच्चा सूत लपेटकर परिक्रमा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन सावित्री ने अपने तप और बुद्धि के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे, इसलिए यह दिन विशेष रूप से शक्तिशाली माना जाता है। वहीं वट सावित्री पूर्णिमा की परंपरा मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में देखने को मिलती है। इस परंपरा में यह व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन किया जाता है।
वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा अत्यंत प्रसिद्ध और प्रेरणादायक मानी जाती है। यह कथा माता सावित्री और उनके पति सत्यवान के अटूट प्रेम, समर्पण और पतिव्रता धर्म पर आधारित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन समय में मद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या और देवी सावित्री की आराधना की। देवी की कृपा से उनके घर एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान, तेजस्वी और सुंदर थीं। जब सावित्री विवाह योग्य हुईं, तब उनके पिता ने उन्हें स्वयं अपना वर चुनने की अनुमति दी। सावित्री ने वन में रहने वाले राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। सत्यवान बहुत गुणवान, सत्यवादी और पराक्रमी थे, लेकिन ऋषि नारद ने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान की आयु बहुत कम है और विवाह के एक वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। यह सुनकर राजा चिंतित हो गए और सावित्री को दूसरा वर चुनने के लिए कहा, लेकिन सावित्री ने दृढ़ निश्चय के साथ कहा कि वह केवल सत्यवान को ही अपना पति मान चुकी हैं और अब अपना निर्णय नहीं बदलेंगी। विवाह के बाद सावित्री अपने पति सत्यवान और सास-ससुर के साथ वन में रहने लगीं। जैसे-जैसे सत्यवान की मृत्यु का समय नजदीक आने लगा, सावित्री ने कठोर व्रत और तपस्या शुरू कर दी। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी, उस दिन सावित्री भी उनके साथ जंगल में गईं। जंगल में लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान को चक्कर आया और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। उसी समय यमराज वहां आए और सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे।
सावित्री ने यमराज का पीछा करना शुरू कर दिया। यमराज ने उन्हें वापस लौटने के लिए कहा, लेकिन सावित्री ने अपने पतिव्रता धर्म, बुद्धिमत्ता और विनम्रता से यमराज को प्रभावित कर दिया। यमराज ने प्रसन्न होकर सावित्री को वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने पहले अपने अंधे सास-ससुर की आंखों की रोशनी और उनका खोया हुआ राज्य वापस मांगा, जिसे यमराज ने स्वीकार कर लिया। फिर उन्होंने अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा। अंत में सावित्री ने स्वयं के लिए भी सौ पुत्रों का आशीर्वाद मांग लिया। यमराज ने जब यह वरदान दे दिया, तब सावित्री ने विनम्रता से कहा कि बिना पति के वह संतान प्राप्ति कैसे कर सकती हैं। तब यमराज को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिए। इस प्रकार सावित्री ने अपने तप, बुद्धिमत्ता, प्रेम और अटूट पतिव्रता धर्म के बल पर अपने पति को मृत्यु के मुख से वापस प्राप्त कर लिया। इसी घटना की स्मृति में विवाहित महिलाएं वट सावित्री व्रत रखती हैं और बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं। माना जाता है कि जिस प्रकार सावित्री ने अपने पति की रक्षा की थी, उसी प्रकार यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य प्रदान करता है। यह कथा भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति, समर्पण, प्रेम और अटूट विश्वास का सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती है।