छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती पर पूरे भारत में वीरता और स्वराज्य के प्रेरणादायक आदर्शों का श्रद्धापूर्वक स्मरण

शिवाजी

छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती 19 फरवरी 2026 को पूरे भारत, विशेषकर महाराष्ट्र में बड़ी धूम-धाम और श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है। यह दिन महान मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज के जन्म-दिवस के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है, जिन्होंने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की, साहस, युद्धनीति, प्रशासनिक प्रतिभा और न्यायप्रियता के आदर्श स्थापित किए। इस वर्ष भी जयंती के मौके पर महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों पुणे, मुंबई, नासिक, कोल्हापुर आदि में परंपरागत उत्सव और कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कई स्थानों पर विशाल शिव जयंती जुलूस, तिरंगा तथा धोल-ताशा की शोभा-यात्राएं निकाली जा रही हैं, साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम, अभिषेक, पूजा-अर्चना और शिवचरित्र के पाठ भी किए जा रहे हैं। प्रशासन ने बड़े पैमाने पर सुरक्षा और ट्रैफिक प्रबंध किए हैं ताकि लोगों की भीड़ में व्यवस्था बनी रहे। राजनीतिक और सामाजिक आयोजन भी इस जयंती का हिस्सा हैं, कुछ शहरों में पारंपरिक कार्यक्रमों पर ज़ोर देते हुए डीजे या लेज़र लाइट जैसे आधुनिक ध्वनि-प्रदूषण-संबंधी तत्वों पर पाबंदी लगाई गई है, ताकि उत्सव का स्वर अधिक संयमित और पारंपरिक रहे। सरकारी और सार्वजनिक सेवाओं में भी प्रभाव देखा जा रहा है: महाराष्ट्र में आज सार्वजनिक अवकाश घोषित है और राज्य के बैंक, सरकारी कार्यालय, स्कूल-कॉलेज आदि बंद हैं। हालांकि कुछ निजी संस्थानों और अन्य राज्यों में कामकाज सामान्य रूप से जारी रहेगा। यातायात में आम समस्याओं या सेवाओं में बदलाव के बारे में पहले से योजना बनाना आवश्यक है। इस वर्ष की जयंती में छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन, उनके शौर्य, स्वराज्य की स्थापना और उनके प्रेरणादायक नेतृत्व के आदर्शों को युवाओं और आम जनता तक पहुँचाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग (महाराष्ट्र) में हुआ था। उनके पिता शाहाजी भोसले एक मराठा सरदार थे और माता जीजाबाई धार्मिक, साहसी और राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत थीं। बाल्यकाल से ही जीजाबाई ने शिवाजी को रामायण-महाभारत की कथाएँ सुनाकर उनमें धर्म, नीति और स्वाभिमान के संस्कार डाले। दादाजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में उन्होंने युद्धकला, प्रशासन और किलेबंदी की शिक्षा प्राप्त की। शिवाजी महाराज ने कम आयु में ही तोरणा किले पर अधिकार कर स्वराज्य स्थापना की नींव रखी। इसके बाद उन्होंने रायगढ़, पुरंदर, प्रतापगढ़ जैसे कई महत्वपूर्ण किलों पर विजय प्राप्त की। उनकी गुरिल्ला युद्ध नीति (गनिमी कावा) अत्यंत प्रभावी थी, जिससे वे शक्तिशाली मुगल और आदिलशाही सेनाओं को भी चकित कर देते थे। 1659 में अफजल खान पर विजय और 1663 में शाइस्ता खान पर साहसिक हमला उनकी वीरता के प्रसिद्ध उदाहरण हैं।

1674 में रायगढ़ किले पर उनका भव्य राज्याभिषेक हुआ और वे औपचारिक रूप से “छत्रपति” बने। उन्होंने एक सशक्त प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की जिसमें अष्टप्रधान मंत्रिमंडल, सुव्यवस्थित राजस्व प्रणाली और नौसेना का गठन शामिल था। शिवाजी महाराज धार्मिक सहिष्णुता के पक्षधर थे, उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को समान सम्मान दिया और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कठोर नियम बनाए। उनकी मृत्यु 3 अप्रैल 1680 को हुई, लेकिन उनका स्वराज्य का सपना आगे चलकर मराठा साम्राज्य के रूप में और भी विस्तृत हुआ। आज भी शिवाजी महाराज को भारत में साहस, राष्ट्रभक्ति, सुशासन और आत्मसम्मान के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने सीमित संसाधनों में भी आत्मविश्वास और रणनीति से बड़े साम्राज्यों को चुनौती दी। समुद्री सुरक्षा के लिए भारत की पहली सशक्त नौसेना का निर्माण किया। प्रजा की सुरक्षा और न्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। महिलाओं और धार्मिक स्थलों की रक्षा के सख्त आदेश दिए। छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन हमें सिखाता है कि दृढ़ संकल्प, सही नेतृत्व और राष्ट्रप्रेम से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।

छत्रपति शिवाजी महाराज के युद्ध भारतीय इतिहास में साहस, रणनीति और गुरिल्ला युद्धकला (गनिमी कावा) के उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं। उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद मुगल, आदिलशाही और कुतुबशाही जैसी शक्तिशाली सल्तनतों का सामना किया और हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की। नीचे उनके प्रमुख युद्धों और सैन्य अभियानों का विस्तृत विवरण दिया गया है।

प्रारंभिक किले विजय अभियान (1645–1655)

युवावस्था में ही शिवाजी महाराज ने तोरणा किले पर कब्ज़ा किया। इसके बाद राजगढ़, कोंडाणा (सिंहगढ़), पुरंदर और रोहिडखोरे जैसे किलों पर अधिकार किया। इन विजयों ने मराठा शक्ति की नींव रखी और बीजापुर सल्तनत को चुनौती दी।

अफजल खान युद्ध – प्रतापगढ़ (1659)

बीजापुर के सेनापति अफजल खान को शिवाजी को समाप्त करने भेजा गया। प्रतापगढ़ किले के पास हुई भेंट में अफजल खान ने धोखे से आक्रमण करने की कोशिश की, लेकिन शिवाजी महाराज ने वाघनख (लोहे के पंजे) से उसका वध कर दिया। इसके बाद मराठा सेना ने बीजापुर की सेना को पराजित किया। यह युद्ध उनकी चतुराई और आत्मरक्षा रणनीति का प्रतीक है।

पन्हाला और बाजी प्रभु का बलिदान (1660)

सिद्दी जौहर ने पन्हाला किले को घेर लिया। शिवाजी महाराज ने रात में किले से निकलकर विश्रामगढ़ की ओर प्रस्थान किया। बाजी प्रभु देशपांडे ने पावनखिंड में मुगलों को रोककर वीरगति पाई। इस घटना ने मराठा इतिहास में अद्भुत बलिदान की मिसाल कायम की।

शाइस्ता खान पर आक्रमण (1663)

मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने शाइस्ता खान को दक्कन भेजा। शिवाजी महाराज ने पुणे में लाल महल पर अचानक हमला कर शाइस्ता खान को घायल कर दिया। यह साहसिक छापामार हमला मुगलों के लिए बड़ी अपमानजनक हार थी।

सूरत पर आक्रमण (1664 और 1670)

शिवाजी महाराज ने मुगलों की आर्थिक शक्ति को कमजोर करने के लिए सूरत पर दो बार आक्रमण किया। इस अभियान से मराठा राज्य को आर्थिक मजबूती मिली और मुगलों की प्रतिष्ठा को धक्का लगा।

पुरंदर की संधि (1665)

राजा जयसिंह के नेतृत्व में मुगल सेना ने पुरंदर किले को घेर लिया। परिस्थिति को देखते हुए शिवाजी महाराज ने 23 किले मुगलों को सौंपने और पुत्र संभाजी को मुगल दरबार भेजने की संधि की। बाद में वे आगरा गए, जहाँ उन्हें नजरबंद कर लिया गया, लेकिन उन्होंने चतुराई से वहाँ से पलायन कर लिया।

शिवाजी महाराज की युद्ध नीति की विशेषताएँ

• गनिमी कावा (गुरिल्ला युद्धकला)
• किलों का रणनीतिक उपयोग
• तेज और अचानक हमले
• स्थानीय भूगोल का गहरा ज्ञान
• मजबूत गुप्तचर तंत्र
• अनुशासित सेना और नैतिक आचरण

छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक के बाद दक्षिणी अभियान (1674–1680)

1674 में रायगढ़ किले पर भव्य राज्याभिषेक के बाद शिवाजी महाराज ने अपने साम्राज्य को केवल महाराष्ट्र तक सीमित न रखकर दक्षिण भारत की ओर विस्तार करने की ठोस योजना बनाई। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य था — बीजापुर और गोलकुंडा की कमजोर होती सल्तनतों का लाभ उठाना, मुगलों को दक्षिण में संतुलित करना, अपने पिता शाहाजी राजे की पुरानी जागीरों (विशेषकर कर्नाटक क्षेत्र) पर अधिकार स्थापित करना तथा मराठा साम्राज्य को आर्थिक और सामरिक रूप से मजबूत बनाना।

1. गोलकुंडा से संधि और रणनीतिक तैयारी (1676)

दक्षिणी अभियान शुरू करने से पहले शिवाजी महाराज ने गोलकुंडा सल्तनत के कुतुबशाही सुल्तान से मैत्री संधि की। इस संधि के तहत उन्हें आर्थिक सहायता और सैन्य सहयोग मिला। इससे बीजापुर के विरुद्ध अभियान चलाना आसान हुआ और दक्षिण में मराठा सेना को रसद व मार्ग समर्थन मिला।

2. कर्नाटक अभियान की शुरुआत (1676–1677)

शिवाजी महाराज ने लगभग 30,000 से अधिक सैनिकों के साथ कर्नाटक की ओर कूच किया। उन्होंने बेलगाम, धारवाड़, कापसी आदि क्षेत्रों पर अधिकार मजबूत किया और आगे बढ़ते हुए तमिलनाडु की दिशा में प्रवेश किया। इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण किलों और नगरों पर कब्ज़ा किया।

3. जिंजी (गिंजी) और वेल्लोर पर विजय

दक्षिणी अभियान की सबसे बड़ी सफलता थी जिंजी किला (गिंजी) पर अधिकार। यह किला अत्यंत मजबूत और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। इसके अलावा वेल्लोर किले पर भी मराठा प्रभाव स्थापित हुआ। जिंजी किला आगे चलकर मराठाओं के लिए सुरक्षित शरणस्थली सिद्ध हुआ, विशेषकर संभाजी महाराज और राजाराम के समय में।

4. तंजावुर और पारिवारिक संबंध

कर्नाटक क्षेत्र में तंजावुर पर उस समय शिवाजी महाराज के सौतेले भाई व्यंकोजी (एकोजी) का शासन था। शिवाजी ने उनके साथ राजनीतिक वार्ता की और पिता शाहाजी की संपत्ति में अपने अधिकार की मांग की। प्रारंभ में मतभेद रहे, लेकिन अंततः समझौता हुआ और मराठा प्रभाव दक्षिण में स्थापित हो गया।

5. प्रशासनिक व्यवस्था और किलेबंदी

शिवाजी महाराज ने जीते हुए क्षेत्रों में केवल सैन्य विजय तक सीमित न रहकर प्रशासनिक ढांचा भी स्थापित किया। उन्होंने विश्वस्त अधिकारियों की नियुक्ति की, कर व्यवस्था व्यवस्थित की और किलों की मरम्मत व सुरक्षा मजबूत की। दक्षिण के किलों को भविष्य की रणनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखकर सुदृढ़ किया गया।

6. नौसेना और समुद्री सुरक्षा

इसी काल में उन्होंने पश्चिमी तट पर अपनी नौसेना को और मजबूत किया। सिद्धियों और पुर्तगालियों की समुद्री गतिविधियों पर नियंत्रण रखने के लिए किलों और बंदरगाहों की सुरक्षा बढ़ाई गई। यह भारत की संगठित समुद्री शक्ति का प्रारंभिक रूप था।

दक्षिणी अभियान का महत्व

• मराठा साम्राज्य का विस्तार महाराष्ट्र से कर्नाटक और तमिलनाडु तक हुआ।
• बीजापुर की शक्ति कमजोर हुई और मुगलों के विरुद्ध संतुलन बना।
• जिंजी जैसे किलों ने भविष्य में मराठाओं को सुरक्षित आधार प्रदान किया।
• मराठा साम्राज्य आर्थिक रूप से अधिक मजबूत हुआ।

1674 से 1680 के बीच का दक्षिणी अभियान शिवाजी महाराज की दूरदर्शिता, कूटनीति और सैन्य नेतृत्व का प्रमाण था। उन्होंने केवल युद्ध जीतने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि स्थायी प्रशासन, रणनीतिक किलों और आर्थिक मजबूती के माध्यम से मराठा साम्राज्य की जड़ें दक्षिण भारत तक फैला दीं। यही कारण है कि उनका यह अभियान भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के युद्ध केवल क्षेत्र विस्तार के लिए नहीं थे, बल्कि स्वराज्य, धर्म और जनता की रक्षा के लिए थे। उनकी सैन्य रणनीति आज भी आधुनिक युद्धकला में अध्ययन का विषय है। उनकी वीरता, संगठन क्षमता और दूरदर्शिता ने मराठा साम्राज्य की मजबूत नींव रखी, जिसने आगे चलकर पूरे भारत के इतिहास को प्रभावित किया।

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