माता सीता के पावन जन्मोत्सव के रूप में श्रद्धा और भक्ति से मनाई जाने वाली जानकी जयंती

जानकी जयंती

सीता अष्टमी या जानकी जयंती 9 फरवरी 2026 को फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाई जा रही है, माता सीता के जन्म दिवस के रूप में प्रसिद्ध है। माता सीता को जानकी (जनक की पुत्री), वैदेही और भगवान श्रीराम की पत्नी के रूप में जाना जाता है; उनके जीवन में त्याग, समर्पण, पवित्रता, धैर्य और मर्यादा के आदर्श देखने को मिलते हैं। इसी कारण भारतीय संस्कृति में उनका व्यक्तित्व आदर्श नारीत्व, धर्म और दृढ़ श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है और उनके जन्म दिवस को श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म मिथिला (वर्तमान नेपाल-भारत सीमा के पास) में राजा जनक के खेत में हल चलाते समय ढूँढे जाने पर हुआ था, इसलिए उन्हें ‘धरती की बेटी’ या भूमिजा भी कहा जाता है। माता सीता सत्य, त्याग, समर्पण, मर्यादा और धर्म की प्रतीक मानी जाती हैं, और जानकी जयंती का पर्व इन गुणों का स्मरण कराता है। इस वर्ष 2026 में जानकी जयंती 9 फरवरी, सोमवार को पड़ेगी। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि सुबह 05:01 बजे 9 फरवरी से प्रारंभ होकर अगले दिन 07:27 बजे 10 फरवरी तक रहेगी, परंतु परंपरा के अनुसार अधिकतर पूजा-पाठ 9 फरवरी को ही किया जाता है।

बाल्यकाल से ही वे सौम्यता, करुणा और बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण थीं। स्वयंवर में भगवान श्रीराम द्वारा शिवधनुष भंग करने पर उनका विवाह हुआ, जो आदर्श दांपत्य जीवन की आधारशिला बना। वनवास के समय माता सीता ने राजसी सुख त्याग कर पति के साथ वन जाने का निर्णय लिया और हर परिस्थिति में धर्म का पालन किया। रावण द्वारा उनका हरण हुआ, किंतु अशोक वाटिका में रहते हुए भी उन्होंने अपने पतिव्रत धर्म और आत्मसम्मान से कोई समझौता नहीं किया। अग्नि परीक्षा के माध्यम से उन्होंने अपनी पवित्रता सिद्ध की। उत्तरकाल में लोकमर्यादा के कारण उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया और उन्हें संस्कार व धर्म की शिक्षा दी। अंततः पृथ्वी माता की गोद में समा कर उन्होंने यह संदेश दिया कि सत्य, आत्मसम्मान और सहनशीलता ही जीवन की सर्वोच्च शक्ति हैं। माता सीता का जीवन आज भी नारी गरिमा, साहस और आदर्श आचरण की प्रेरणा देता है।

धार्मिक रीति-रिवाज़ों में सुबह जल्दी उठकर स्नान करना, घर और मंदिर की सफाई के बाद माता सीता तथा भगवान राम की प्रतिमाओं के सामने पूजा-अर्चना करना शामिल है। भक्त फल, दूध-दही, फूल, नैवेद्य तथा ‘श्री जानकी रामाभ्यां नमः’ जैसे मंत्रों का जाप करते हैं। कई लोग उपवास भी रखते हैं और सुंदरकांड पाठ, कीर्तन तथा रामायण के प्रसंग सुनते-बोलते हैं। वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और दीर्घ आयु की कामना के लिए विशेष पूजा तथा सुहागिन महिलाएँ सीता अष्टमी का व्रत करती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से यह पर्व न केवल माता सीता के जन्म को मनाता है, बल्कि जीवन में धर्म, समर्पण, श्रद्धा और नैतिकता जैसे गुणों को आत्मसात करने का संदेश भी देता है। आज के धार्मिक पंचांग में जानकी जयंती के साथ मासिक कालाष्टमी और अन्य शुभ योग भी जुड़े हुए हैं, जिससे यह दिन भक्तों के लिए और भी शुभ फलदायी माना जा रहा है।

मासिक कालाष्टमी जो कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाई जाती है, मासिक कालाष्टमी 9 फरवरी, सोमवार को पड़ी है।। यह व्रत और पूजा भगवान काल भैरव को समर्पित है, जो भगवान शिव का उग्र और रक्षक रूप माना जाता है। भक्त लोग इस दिन उपवास रखते हैं, भगवान भैरव की पूजा-अर्चना करते हैं तथा उनके माध्यम से भय, बाधा, नकारात्मक ऊर्जा और शत्रु प्रभाव से मुक्ति की कामना करते हैं। पूजा-विधि में भक्त साधारण रूप से सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करते हैं, भगवान काल भैरव के मंदिर या घर में पूजा करते हैं, भैरव मंत्रों का जाप करते हैं, और काले तिल, रोटी, पानी या दूध-दही से भैरव का अभिषेक करते हैं। कई स्थानों पर कुत्तों को भोजन देना भी शुभ माना जाता है क्योंकि कुत्ता काल भैरव का वाहन माना जाता है। मासिक कालाष्टमी का आध्यात्मिक महत्व यह है कि यह भक्त को भय-रहित, सकारात्मक और धर्मपरायण जीवन के लिए प्रेरित करता है और कहा जाता है कि शिव-भैरव की कृपा से जीवन में बाधाएँ कम होती हैं तथा मन की शक्ति, साहस और आत्म-विश्वास बढ़ता है।

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