जया एकादशी हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत तथा पूजा का दिन माना जाता है। यह माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर आती है और विशेष रूप से भगवान विष्णु तथा माँ लक्ष्मी की आराधना के लिए समर्पित होती है। सनातन परंपरा में माना गया है कि इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की भक्ति करने से पाप का नाश, आध्यात्मिक शुद्धि, मन की शांति, तथा जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं, घर और पूजा स्थल की सफाई करके विष्णु जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक, फूल, तुलसी पत्र और नैवेद्य अर्पित करते हैं। वे “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” तथा श्री कृष्ण या विष्णु के मंत्रों का जप करते हैं और एकादशी कथा का पाठ सुनते/पढ़ते हैं। व्रत कुछ लोग निर्जला (ना भोजन, ना जल) रखते हैं, जबकि आवश्यकतानुसार फलाहारी व्रत भी रखा जाता है। व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि के प्रातः मुहूर्त में किया जाता है। जया एकादशी का व्रत जीवन में इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति, मनोकामना पूर्ति और जन्म-जन्मान्तर के पापों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है।
इस वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 28 जनवरी 2026, शाम लगभग 4:34–4:36 बजे से प्रारंभ होती है और 29 जनवरी 2026, लगभग 1:55 बजे तक रहती है। चूंकि एकादशी तिथि का उदय समय (सूर्योदय के समय) 29 जनवरी की सुबह आता है, अतः जया एकादशी का व्रत गुरुवार, 29 जनवरी 2026 को रखा जाएगा। पारण (व्रत तोड़ने) का शुभ मुहूर्त 30 जनवरी 2026 की सुबह लगभग 7:10 बजे से 9:20 बजे तक है। जया एकादशी के दिन गुरुवार का संयोग विशेष शुभ माना जाता है क्योंकि गुरुवार स्वयं भगवान विष्णु से जुड़ा दिन है। इस अवसर पर तुलसी के पौधे को भी पूजा में शामिल करना तथा विष्णु-लक्ष्मी मंत्रों का जप करना शुभ फलदायी माना गया है। साथ ही दान-पुण्य का विशेष महत्व है; जैसे तुलसी का चन्दन, फल, सात प्रकार के अनाज, कंबल आदि दान करने से जीवन में सुख, समृद्धि और मानसिक संतोष की प्राप्ति होती है।
प्राचीन काल की बात है। स्वर्गलोक में इन्द्र देव का राज्य था, जहाँ सभी देवता आनंद और ऐश्वर्य के साथ रहते थे। एक बार देवसभा में गंधर्व और अप्सराएँ नृत्य-संगीत प्रस्तुत कर रही थीं। उसी सभा में माल्यवान नाम का एक गंधर्व और उसकी पत्नी पुष्पवती भी उपस्थित थे। सभा के दौरान दोनों का मन एक-दूसरे में अत्यधिक आसक्त हो गया, जिससे उनका ध्यान भंग हुआ और वे नृत्य-संगीत में गलती कर बैठे। इन्द्र देव ने इसे अपने अपमान के रूप में लिया और क्रोधित होकर दोनों को स्वर्ग से निष्कासित कर पृथ्वी पर पिशाच योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। श्राप के कारण माल्यवान और पुष्पवती हिमालय के निर्जन और अत्यंत कष्टदायक क्षेत्र में पिशाच रूप में रहने लगे। वे अत्यंत दुखी रहते, न उन्हें भोजन का सुख मिलता, न नींद आती और न ही आपसी सुख। एक बार माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी आई, जो कि जया एकादशी थी। संयोगवश उस दिन दोनों को भोजन नहीं मिला और वे अनजाने में ही निर्जल व्रत में रहे। पूरी रात ठंड और कष्ट सहते हुए वे जागते रहे।
इस एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से अगले दिन उनके पिशाच शरीर नष्ट हो गए और उन्हें पुनः दिव्य स्वरूप प्राप्त हुआ। वे दोनों पुनः स्वर्गलोक पहुँच गए। जब इन्द्र देव ने उन्हें वहाँ देखा तो आश्चर्यचकित हुए और कारण पूछा। तब माल्यवान और पुष्पवती ने बताया कि जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से उन्हें इस श्राप से मुक्ति मिली है। यह सुनकर इन्द्र देव ने भी जया एकादशी की महिमा को स्वीकार किया। तभी से यह माना जाता है कि जया एकादशी का व्रत मनुष्य को बड़े-से-बड़े पापों, दोषों और नकारात्मक योनियों से मुक्त करता है। इस व्रत को करने से भय, दुख, दरिद्रता और जन्म-जन्मांतर के कष्ट समाप्त होते हैं तथा भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जो श्रद्धा और नियमपूर्वक जया एकादशी का व्रत करता है, उसके जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं, मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
जया एकादशी का व्रत भगवान श्री विष्णु को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। यह पूजा श्रद्धा, पवित्रता और संयम के साथ की जाती है। नीचे पूरी पूजा विधि क्रमवार दी गई है। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें। स्नान करके स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करें और मन में व्रत का संकल्प लें कि “मैं जया एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति हेतु कर रहा/रही हूँ।” एक स्वच्छ चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएँ। उस पर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें। पास में माँ लक्ष्मी की प्रतिमा भी रख सकते हैं। कलश में जल भरकर उसमें आम या अशोक के पत्ते और नारियल रखें। भगवान विष्णु को गंगाजल या शुद्ध जल से अभिषेक करें। फिर पीले फूल, तुलसी दल (तुलसी पत्ता), अक्षत (चावल), चंदन और धूप-दीप अर्पित करें। नैवेद्य में फल, मखाना, कुट्टू या साबूदाने से बनी वस्तुएँ अर्पित करें (यदि फलाहार कर रहे हों)। पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें। इसके बाद भगवान विष्णु की आरती करें और शंख बजाएँ। अब जया एकादशी की व्रत कथा का पाठ करें या ध्यानपूर्वक सुनें। कथा के बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए उनसे पापों से मुक्ति और जीवन में सुख-शांति की प्रार्थना करें। इस दिन अन्न का सेवन न करें। सामर्थ्य हो तो निर्जल व्रत रखें, अन्यथा फल, दूध या जल ग्रहण कर सकते हैं। क्रोध, झूठ, निंदा और बुरे विचारों से दूर रहें। रात में भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें और यथासंभव जागरण करें। यह व्रत के फल को कई गुना बढ़ाता है। अगले दिन द्वादशी तिथि में स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करें और ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन या दान देकर व्रत का पारण करें। जया एकादशी की पूजा करने से भय, रोग, दरिद्रता और पाप नष्ट होते हैं तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।