4 मार्च को होली का पर्व रंग प्रेम और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक, 3 मार्च को चंद्र ग्रहण संयोग

4 मार्च

होली भारत और अन्य जगहों पर बेहद उत्साह और प्यार से मनाई जा रही है, लेकिन इस बार त्योहार की तारीख को लेकर कुछ धार्मिक और ज्योतिषीय मतभेद के कारण थोड़ी भ्रम की स्थिति भी बनी है; परंतु पंचांग के अनुसार इस वर्ष होलिका दहन 3 मार्च 2026 को शाम के शुभ मुहूर्त में किया जाएगा और इसके अगले दिन 4 मार्च 2026 को रंगों वाली होली यानी धुलंडी मनाई जाएगी, जो पूरे देश में वसंत का स्वागत, बुराई पर अच्छाई की विजय और पारिवारिक मेलजोल का प्रतीक है, और लोग इस दिन गुलाल, रंग और पानी के साथ अपने प्रियजनों के साथ आनंद मनाते हैं। होलिका दहन का आयोजन पारंपरिक तरीके से जलाकर बुराई और दुर्बलता का नाश करने के लिए किया जाता है, जिसमें लोग पूजा, मंत्र और आराधना के साथ परिवार की सुरक्षा और खुशहाली की कामना करते हैं और फिर अगले दिन सुबह से ही बच्चों से लेकर बड़े तक रंग, पिचकारी और संगीत के साथ त्योहार मनाते हैं। इस साल होली के आसपास चंद्र ग्रहण और भद्रा काल को लेकर कुछ धार्मिक आंकलन और चर्चा भी रही है, जिसकी वजह से कुछ स्थानों पर होलिका दहन की तिथि और शुभ मुहूर्त को लेकर थोड़ा विवाद सुर्खियों में आया, लेकिन ज्योतिषाचार्यों ने यह कहा कि शुभ समय में ही होलिका का दहन कर त्योहार को सार्थक बनाया जा सकता है। सरकारी स्तर पर भी त्योहार के मद्देनज़र छुट्टियों की घोषणा और स्कूलों तथा कार्यालयों में बंदी जैसे कार्यक्रमों का समायोजन किया गया है, जिससे लोग अपने घरों और समाजों के साथ इस रंगीन और हर्षोल्लास भरे त्योहार को मनाने के लिए पर्याप्त समय पा सकें। इस साल की होली न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव के रूप में, बल्कि पारिवारिक मेलजोल, मित्रता और सामाजिक समरसता के प्रतीक के रूप में भी दुर्लभ और ख़ास बन रही है।

होली की कथा हिंदू धर्म में बहुत प्रचलित है और इसे मुख्य रूप से बुराई पर अच्छाई की विजय और भक्ति तथा प्रेम का पर्व माना जाता है। इसे समझने के लिए सबसे प्रसिद्ध कथा हिरण्यकश्यप, प्रह्लाद और होलिका की कथा है। कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप एक अत्यंत शक्तिशाली राक्षस राजा था, जिसने खुद को भगवान मान लिया और सभी से पूजा करवाने लगा। उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को भी उसकी पूजा करने का आदेश दिया। परंतु प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे और उन्होंने अपने पिता की मूर्तिपूजा करने से इंकार कर दिया। हिरण्यकश्यप बहुत क्रोधित हुआ और उसने प्रह्लाद को मारने के कई उपाय किए, लेकिन हर बार भगवान विष्णु ने प्रह्लाद को बचा लिया। अंततः हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की मदद ली, जो अग्नि में प्रवेश करने की विशेष शक्ति रखती थी। उसने प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने का प्रयास किया। लेकिन भगवान की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे, जिससे बुराई पर अच्छाई की जीत हुई। इसी घटना की स्मृति में होली का पर्व मनाया जाता है। होलिका दहन की रात अग्नि जलाकर बुराई का प्रतीक होलिका का नाश किया जाता है, और अगले दिन रंगों के साथ होली मनाई जाती है। इसके अलावा, होली राधा और कृष्ण के प्रेम से भी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि कृष्ण जी ने राधा और गोकुल की महिलाओं के साथ रंगों का खेल खेला, जिससे प्रेम और उल्लास का प्रतीक बन गया। इस दिन लोग गुलाल, रंग, पानी और फूलों से खेलते हैं, भले ही वे किसी भी धर्म या उम्र के हों। इस प्रकार, होली न केवल धार्मिक महत्त्व रखती है बल्कि यह सामाजिक मेलजोल, प्रेम, भाईचारे और आनंद का पर्व भी है।

छोटी होली पर चंद्र ग्रहण का संयोग:

3 मार्च 2026 को मंगलवार को साल का पहला पूर्ण चंद्र ग्रहण लगेगा, जो फाल्गुन पूर्णिमा के दिन ही घटित होगा और यह खगोलीय घटना “ब्लड मून” के रूप में जानी जाती है क्योंकि ग्रहण के समय चंद्रमा लाल‑भूरा दिखाई देगा। यह ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच सीधी रेखा बन जाती है और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है, जिससे चंद्रमा पूरी तरह पृथ्वी की छाया में डूब जाता है। इस खास टोटल चंद्र ग्रहण को दक्षिण पूर्वी एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और प्रशांत क्षेत्रों में पूरी तरह देखा जा सकेगा, जबकि भारत के अधिकांश हिस्सों में चंद्रमा उदय के समय पहले से ही ग्रहण का कुछ हिस्सा दिखाई देगा। भारत में ग्रहण का समय दोपहर के बाद से शाम तक रहेगा; ज्योतिषानुसार सूतक काल भी रहेगा, जिसके दौरान कुछ धार्मिक नियमों का पालन किया जाता है। ग्रहण की पूर्ण छाया शाम के समय में दिखाई दे सकती है और चंद्रमा को लाल रंग में देखा जा सकता है, जिसे बिना किसी विशेष उपकरण के भी साधारण आँखों से देखा जा सकता है। यह खगोलीय घटना कई देशों में “ब्लड मून” के रूप में लोकप्रिय है और यह 2026 का एकमात्र पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा, जिससे ग्रहण के बाद लगभग तीन वर्षों तक ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा।

3 मार्च 2026 के चंद्र ग्रहण (पूर्ण चंद्र ग्रहण) के लिए भारत में समयानुसार विवरण इस प्रकार है:

  • सूतक काल : 3 मार्च 2026 को सुबह 9:39 बजे से शुरू होकर शाम 06:57 बजे तक रहेगा। सूतक काल के दौरान धार्मिक कार्यों और शुभ कार्यों को स्थगित करने की सलाह दी जाती है।

  • ग्रहण समय : ग्रहण का प्रारंभ शाम 06:26 बजे से होगा और ग्रहण शाम 06:57 बजे तक चलेगा। इस समय में चंद्रमा पृथ्वी की छाया में पूरी तरह डूबेगा और लाल रंग में दिखाई देगा।

इस दौरान लोग अक्सर स्नान, व्रत, मंत्र जाप और ध्यान का पालन करते हैं, और ग्रहण के बाद ही भोजन, यात्रा और शुभ कार्य करना उचित माना जाता है।

वसंत पूर्णिमा का उत्सव:

वसंत पूर्णिमा एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक दिन के रूप में मनाई जा रही है, जो वसंत ऋतु के मध्य में आने वाली पूर्णिमा तिथि के कारण विशेष महत्व रखती है। इस साल वसंत पूर्णिमा फाल्गुन मास की पूर्णिमा के रूप में 3 मार्च 2026 को मनाई जाएगी, जिसकी पूर्णिमा तिथि 2 मार्च शाम 05:55 बजे से शुरू होकर 3 मार्च शाम 05:07 बजे तक रहेगी, और इसी दिन वसंत पूर्णिमा की पूजा और अनुष्ठान किए जाते हैं। यह दिन न केवल पूर्णिमा का धार्मिक महत्त्व रखता है, बल्कि वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक भी है, जब प्रकृति में नई ऊर्जा, ताजगी और उज्ज्वलता आती है। वसंत पूर्णिमा को हिंदू धर्म में पूर्णिमा के चाँद की पूजा और विभिन्न धार्मिक गतिविधियाँ जैसे पूजा, व्रत, पूजन‑अनुष्ठान, और सत्संग का आयोजन किया जाता है। इस दिन लोग भगवान विष्णु, चंद्र देव और अन्य देवताओं की आराधना करते हैं तथा सात्विक जीवन के गुणों को अपनाने की प्रार्थना करते हैं। 2026 में यह पर्व होली के साथ भी मेल खा रहा है, क्योंकि होली भी इसी फाल्गुन पूर्णिमा के समय के आसपास मनाई जाती है, जिससे यह दिन और भी उत्साह और भक्ति‑भाव के साथ जुड़े अवसरों के रूप में देखा जा रहा है।

बंगाल और ओडिशा का पारंपरिक त्योहार:

दोल पूर्णिमा भारत में होली के साथ जुड़ा एक प्रमुख पारंपरिक त्योहार है, जिसे खासकर वृषभानु जन्माष्टमी, ब्रज, बंगाल और ओडिशा में बड़ी धूम‑धाम से मनाया जाता है। यह दिन फाल्गुन मास की पूर्णिमा के अवसर पर आता है और प्रायः होली के आसपास ही पड़ता है, इसलिए इसे ‘होली मिलन’ के रूप में भी देखा जाता है। दोल का अर्थ है झूला‑झूटा हुआ झूला, और इस दिन भगवान कृष्ण और राधा के स्वरूपों को सुंदर कपड़ों और आभूषणों से सजा कर रंग‑बिरंगे झूलों पर रखा जाता है। भक्तजन कीर्तन, भजन‑समारोह, मंत्रोच्चारण और झूला‑यात्रा का आयोजन करते हैं तथा भगवान के नाम का संजक कीर्तन बड़े पैमाने पर करते हैं, जिससे वातावरण भक्ति और उल्लास से भर जाता है। दोल पूर्णिमा का धार्मिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह राधा‑कृष्ण के प्रेम, भक्ति और मिलन का प्रतीक माना जाता है; भक्त यह मानते हैं कि आज के दिन भगवान और उनके प्रिय भक्त के बीच का प्रेम सर्वोच्च और दिव्य अनुभवों के लिए खुलता है। इसके अलावा, इस दिन बृज में रंगों के खेल, लीलाओं और वृंदावन की परंपरा का विशेष महत्व है, जिससे पूरा वातावरण उत्सव‑मय हो जाता है। सामाजिक रूप से भी दोल पूर्णिमा का उत्सव महत्वपूर्ण है क्योंकि यह रंगों, संगीत और सामूहिक भक्ति के साथ लोगों को एकजुट करता है। इस दिन घर‑घर रंग, गुलाल और फूलों से भगवान की प्रतिमा की पूजा होती है, तथा प्रसाद वितरण, दान‑धर्म और सत्संग का भी विशेष आयोजन होता है। इस प्रकार, दोल पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह भक्ति, प्रेम, रंग और संस्कृति का एक सुंदर उत्सव भी है जो समुदाय को जोड़ता है और जीवन में उत्साह तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

लक्ष्मी जयंती का शुभ पर्व:

लक्ष्मी जयंती एक पवित्र त्योहार है, जो देवी लक्ष्मी  धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी  के जन्म दिवस के रूप में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।  मान्यताओं के अनुसार, देवी लक्ष्मी का जन्म फाल्गुन पूर्णिमा पर क्षीर सागर के विशाल मन्थन के समय हुआ था, जिसे समुद्र मन्थन के रूप में भी जाना जाता है।उल्लेखनीय है कि, फाल्गुन पूर्णिमा के दिन अधिकांशतः उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र होता है। अतः उत्तराफाल्गुनी का दिन भी लक्ष्मी जयन्ती से सम्बन्धित है। लक्ष्मी जयन्ती मुख्यतः दक्षिण भारतीय राज्यों में अधिक मनायी जाती है तथा उत्तर भारतीय राज्यों में यह कम प्रचलित हैं। लक्ष्मी जयन्ती का दिन धन-सम्पदा की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। लोग लक्ष्मी जयन्ती के दिन लक्ष्मी होम (हवन) का आयोजन करते हैं। लक्ष्मी होम अनुष्ठान के समय देवी लक्ष्मी सहस्रनामावली, अर्थात देवी लक्ष्मी के 1000 नाम तथा श्री सूक्तम् का पाठ किया जाता है। देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु शहद में डूबे हुये कमल पुष्पों की आहुति प्रदान की जाती हैऔर इस वर्ष यह 3 मार्च 2025 को मनाया गया। भगवान विष्णु की अर्धांगिनी और सुख‑समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी को हिन्दू धर्म में घर‑घर पूजा जाता है, इसलिए लक्ष्मी जयंती पर भक्तगण अपने घरों, मंदिरों एवं कार्यालयों में दीये, फूल, नैवेद्य और धूप‑अगरबत्ती की विधि‑पूर्वक पूजा करते हैं। इस दिन विशेष रूप से शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी पूजन, सप्तशती पाठ, लक्ष्मी मंत्रों का जाप और चालीसा का पाठ किया जाता है ताकि जीवन में धन‑संपत्ति, सुख, शांति व समृद्धि बनी रहे। कई जगहों पर भजन‑कीर्तन, कथा‑वाचन और सत्संग का आयोजन भी होता है, जिसमें भक्ति‑भाव से माता लक्ष्मी का गुणगान किया जाता है। पारंपरिक मान्यता है कि इस दिन की गई पूजा से न केवल भौतिक समृद्धि, बल्कि आध्यात्मिक शांति और मानसिक संतुलन भी प्राप्त होता है। घर‑घर दीपक जला कर अंधकार से प्रकाश की ओर, निराशा से आशा की ओर, और कठिनाइयों से उन्नति की ओर कदम बढ़ाने का संदेश भी इस पर्व से जुड़ा है। इसलिए लक्ष्मी जयंती न केवल पूजा‑अर्चना का दिन है, बल्कि परिवार, मित्र और समाज में प्रेम, सौहार्द और सकारात्मक ऊर्जा फैलाने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। 03 मार्च को होलिका दहन होगा और चंद्र ग्रहण भी लगेगा।

लक्ष्मी जयंती की पूजा का शुभ मुहूर्त:

लक्ष्मी जयंती के दिन सूर्योदय सुबह 05 बजकर 35 पर होगा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 05 बजकर 13 मिनट पर शुरू होगा ओर 06 बजकर 01 मिनट तक रहेगा। 3 मार्च को लक्ष्मी जयंती के साथ ही चंद्र ग्रहण का योग भी बन रहा है, जिसके कारण लक्ष्मी पूजन सुबह ही 9 बजे से पहले यानी कि सूतक काल लगने से पहले ही कर लेना सही होगा या फिर शाम को चंद्र ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान करने के पाश्चात्य और पूरे घर में गंगाजल छिड़कने के बाद भी कर सकते हैं।

लक्ष्मी जयंती पूजा विधि:

लक्ष्मी जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके शुद्ध पीले रंग के कपड़े धारण करें। मां लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर के सामने घी का दीपक जलाएं। माता रानी को लाल रंग के फूल, इत्र, फल, वस्त्र और श्रृंगार का सामान चढ़ाएं। लक्ष्मी मंत्र, लक्ष्मी चालीसा और श्री सुक्त का पाठ करें. आरती करके पूजा का समापन करें।

मासी माघम ओर अट्टुकाल पोंगल जैसे धार्मिक और परम्परागत संस्कृति:

मासी माघम तमिल कैलेंडर के मासी महीने (फाल्गुन/माघ) की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जब भगवान शिव, विष्णु या स्थानीय मंदिरों में विशेष पूजन और स्नान अनुष्ठान आयोजित होते हैं। इस दिन भक्त लोग पवित्र जल में स्नान करने के लिए तटों और कुंडों पर आते हैं क्योंकि मान्यता है कि इस दिन स्नान करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और धार्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है। तमिलनाडु के माही नदी तटों, कोयम्बटूर, तंजावुर और त्रिची जैसे कई स्थानों पर मासी माघम भव्य रूप से मनाई जाती है, जहाँ हजारों की संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं और भगवान के मंदिरों में भजन‑कीर्तन तथा विशेष आराधना करते हैं। दूसरी ओर, अट्टुकाल पोंगल दक्षिण भारत के सबसे प्रमुख और विश्वविख्यात त्योहारों में से एक है, जो विशेष रूप से केरल के त्रिवेंद्रम (तिरुवनंतपुरम) के अट्टुकाल भगवती मंदिर में मनाया जाता है। यह उत्सव मुख्यतः अनंतपोस्सु या भगवती अट्टुकाल देवी के सम्मान में होता है और इसे अक्सर लेडीज़ फेस्टिवल के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि इसमें लाखों महिलाएँ पारंपरिक सफ़ेद साड़ी पहनकर भाग लेती हैं। यह पर्व आमतौर पर माघ माह में जूलै/फरवरी‑मार्च के बीच आता है और पोंगल (धान/अनाज पकाने की परंपरा) के साथ जोड़ा गया है, जिसमें भक्तगण देवी को चावल, गुड़ और कच्चा दूध अर्पित करते हैं और सुख‑समृद्धि तथा परिवार की भलाई के लिए प्रार्थना करते हैं। इन दोनों त्योहारों में धार्मिक आस्था, पारंपरिक रीतियाँ और सामूहिक भक्ति का गहन भाव होता है, जिससे न केवल व्यक्तिगत पुण्य की अनुभूति होती है बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक सौहार्द भी सुदृढ़ होता है। मासी माघम जहाँ पवित्र स्नान और भगवान के प्रति समर्पण का प्रतीक है, वहीं अट्टुकाल पोंगल श्रद्धालुओं को देवी की अनुकंपा और जीवन में समृद्धि की कामना से जोड़ता है; दोनों ही त्योहारों की अपनी अनूठी धार्मिक महत्ता और पूजन‑आराधना की समृद्ध परंपरा है।

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