पापमोचनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित अत्यंत पवित्र व्रत माना जाता है, जो एकादशी होलिका दहन और चैत्र नवरात्रि के मध्य में आती है उसे पापमोचनी एकादशी के रूप में जाना जाता हैं। यह सम्वत साल की आखिरी एकादशी है और युगादी से पहले पड़ती हैं। उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार चैत्र माह में कृष्ण पक्ष के दौरान और दक्षिण भारतीय अमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार फाल्गुन माह में कृष्ण पक्ष के दौरान पापमोचनी एकादशी पड़ती है। पूर्णिमान्त पञ्चाङ्ग और अमान्त पञ्चाङ्ग का यह भेद नाम-मात्र का है और दोनों पञ्चाङ्गों में पापमोचनी एकादशी का व्रत एक ही दिन पड़ता है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार वर्तमान में यह मार्च या अप्रैल के महीने में आती है। पापमोचनी एकादशी 15 मार्च (रविवार) को मनाई जाएगी। इस दिन की एकादशी तिथि 14 मार्च 2026 को सुबह लगभग 8:10 बजे से प्रारंभ होकर 15 मार्च 2026 को सुबह लगभग 9:16 बजे तक रहेगी, जबकि व्रत का पारण 16 मार्च की सुबह लगभग 6:30 से 8:54 बजे के बीच किया जाएगा।
पापमोचनी एकादशी का व्रत भगवान भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है और इस दिन विधि-विधान से पूजा करने से सभी पापों से मुक्ति तथा जीवन में सुख-शांति प्राप्त होती है। इस व्रत का महत्व भविष्य पुराण में भी बताया गया है। श्रद्धालु इस दिन पूरे नियम और भक्ति के साथ व्रत रखकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं।
पापमोचनी एकादशी की पूजा विधि:
पापमोचनी एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करना, दीप जलाना, तुलसी पत्र अर्पित करना और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। व्रत रखने वाले व्यक्ति को पूरे दिन सात्विक रहना चाहिए और मन, वचन तथा कर्म से पवित्रता बनाए रखनी चाहिए।
इस दिन अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए, इसलिए अधिकांश लोग फलाहार या केवल फल-दूध लेकर व्रत रखते हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु निर्जला व्रत भी करते हैं। एकादशी के दिन चावल, गेहूं, दाल और तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। व्रत के दौरान क्रोध, झूठ बोलना, विवाद करना, किसी की निंदा करना या किसी को कष्ट देना भी वर्जित माना गया है।
एकादशी की रात को भजन-कीर्तन, भगवान विष्णु का स्मरण और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करना शुभ माना जाता है। अगले दिन द्वादशी तिथि में सुबह भगवान की पूजा करके विधि-विधान से व्रत का पारण करना चाहिए और ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को दान देना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के पापों से मुक्ति मिलती है।
क्या करें:
- इस दिन भगवान विष्णु का ध्यान, जप और पूजा करें।
- तुलसी के पत्ते भगवान को अर्पित करें और तुलसी की पूजा करें।
- व्रत के दौरान सात्विक भोजन या फलाहार करें।
- गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान दें।
- दिनभर भगवान का स्मरण करें और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें।
क्या न करें:
- एकादशी के दिन चावल, गेहूं और तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
- क्रोध, झूठ, विवाद और किसी का अपमान करने से बचना चाहिए।
- इस दिन लहसुन-प्याज और भारी भोजन से भी परहेज करना चाहिए।
- अनावश्यक नकारात्मक विचारों और बुरे कर्मों से दूर रहना चाहिए।
मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियम से पापमोचनी एकादशी का व्रत करता है, उसके जीवन के सभी पाप दूर होते हैं और उसे आध्यात्मिक शांति तथा पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
पापमोचनी एकादशी की पूरी व्रत कथा:
पापमोचनी एकादशी का अर्थ है “पापों से मुक्ति दिलाने वाली एकादशी”। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन श्रद्धा और नियम के साथ व्रत रखने तथा भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति के पिछले जन्मों और वर्तमान जीवन के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। पापमोचनी एकादशी की व्रत कथा का वर्णन भविष्य पुराण में मिलता है। एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है और इस व्रत को करने से मनुष्य को क्या फल प्राप्त होता है। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें पापमोचनी एकादशी की कथा सुनाई और बताया कि यह एकादशी मनुष्य को उसके बड़े-से-बड़े पापों से भी मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है।
प्राचीन समय में चैत्ररथ नामक सुंदर वन में एक महान तपस्वी ऋषि मेधावी कठोर तपस्या कर रहे थे। उसी वन में देवताओं के राजा इंद्र की सभा की एक अत्यंत सुंदर अप्सरा मंजुघोषा भी रहती थी। कामदेव के प्रभाव और अपनी सुंदरता के कारण मंजुघोषा ने ऋषि मेधावी की तपस्या भंग करने का प्रयास किया। उसने मधुर संगीत और नृत्य से ऋषि का मन मोह लिया। धीरे-धीरे ऋषि मेधावी उसका आकर्षण रोक नहीं पाए और वे उसकी मोह-माया में फँस गए। कहा जाता है कि वे कई वर्षों तक उसके साथ समय बिताते रहे और अपनी कठोर तपस्या भूल गए। एक दिन अचानक ऋषि मेधावी को अपनी गलती का एहसास हुआ कि वे तपस्या का मार्ग छोड़कर मोह-माया में फँस गए हैं। क्रोध में आकर उन्होंने मंजुघोषा को श्राप दे दिया कि वह पिशाचिनी बन जाएगी। श्राप सुनकर मंजुघोषा बहुत दुखी हुई और ऋषि से क्षमा मांगने लगी। तब ऋषि का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कहा कि यदि वह पापमोचनी एकादशी का व्रत श्रद्धा और नियम से करेगी तो उसे इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।
मंजुघोषा ने पूरे श्रद्धा-भाव से पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह श्राप से मुक्त हो गई और पुनः अपने दिव्य स्वरूप में स्वर्ग लोक लौट गई। बाद में ऋषि मेधावी ने भी अपने पिता ऋषि च्यवन के कहने पर पापमोचनी एकादशी का व्रत किया, जिससे उनके भी सभी पाप नष्ट हो गए और उन्हें फिर से तपस्या की शक्ति प्राप्त हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने अंत में युधिष्ठिर से कहा कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा, भक्ति और नियम के साथ पापमोचनी एकादशी का व्रत करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, जीवन में सुख-शांति आती है और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए इस एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी और पापों से मुक्ति दिलाने वाली माना गया है।