त्रयोदशी की संध्या में भगवान शिव के चरणों में समर्पित श्रद्धा का नाम शुक्र प्रदोष व्रत

प्रदोष

प्रदोष व्रत हिंदू धर्म में भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत है, जिसे हर महीने त्रयोदशी तिथि के प्रदोष काल में रखा जाता है। जनवरी  में यह व्रत शुक्रवार, 16 जनवरी 2026 को माघ कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि में मनाया जाएगा, इसलिए इसे शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाता है। माघ कृष्ण त्रयोदशी तिथि 15 जनवरी की रात्रि 8:16 बजे से शुरू होकर 16 जनवरी की रात 10:21 बजे तक रहेगी, और इस तिथि में ही प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का शुभ समय) आएगा। 16 जनवरी को शाम लगभग 5:47 बजे से रात 8:29 बजे तक प्रदोष काल रहेगा, इसी समय में व्रत की मुख्य पूजा‑अर्चना की जाती है, क्योंकि इस काल में भगवान शिव‑पार्वती की विशेष कृपा मानी जाती है। यह व्रत शुक्रवार के दिन पड़ने के कारण शुक्र प्रदोष कहलाता है, जिसका अर्थ है कि शुक्रवार की शुभता और शिवजी की कृपा से जीवन में सुख‑समृद्धि, वैवाहिक जीवन में मधुरता, धन‑धान्य की वृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। आमतौर पर इससे जीवन के कष्ट, रोग, दोष व बाधाएँ दूर होती हैं और भक्तों को भगवान शिव की अनंत कृपा प्राप्त होती है।

शुक्र प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ‑सुथरे वस्त्र (सफ़ेद या हल्के रंग के) धारण कर व्रत का संकल्प लें; फिर दिन भर उपवास/निर्जल या सरल फलाहार रखें और संध्याकाल अर्थात प्रदोष काल में पूजा शुरू करें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके शिव देव की मूर्ति या शिवलिंग के सामने दीपक, धूप, अक्षत और गंगाजल रखें, उसके बाद शिवलिंग पर गंगाजल से अभिषेक करें और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद) तथा पंचरत्न आदि से भी शिवलिंग पर पंचामृत अभिषेक करें। इसके बाद बेलपत्र, पुष्प, धूप‑दीप, फल और नैवैद्य (भोग) अर्पित करें और भगवान शिव तथा माता पार्वती की आराधना करें। पूजा के दौरान या बाद में “ॐ नमः शिवाय” जैसे मंत्रों का 108 बार जाप करें तथा व्रत कथा का पाठ कर सकते हैं। अंत में आरती करें, प्रसाद वितरित करें और फिर व्रत का पारण करें। ऐसा करने से घर में शांति, समृद्धि, स्वास्थ्य तथा भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह पूजा त्रयोदशी तिथि के प्रदोष काल में ही सम्पन्न करना शुभ माना जाता है।

प्रदोष व्रत के दिन शाम के प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा/अर्चना करना शुभ होता है। शिवलिंग पर दही, घी, शहद आदि पंचामृत से अभिषेक करें और “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें; ऐसा मान्यता है कि इसकी शक्ति से शुभ फल प्राप्त होते हैं और ग्रह दोष शांत होते हैं। शुक्र ग्रह को सौंदर्य, सुख‑समृद्धि और वैभव का कारक माना जाता है। व्रत के दिन सफेद वस्त्र पहनना और प्रदोष काल में कमल का पुष्प, खीर/मिठाई अर्पित करना तथा मंत्र का जाप करने से धन‑समृद्धि में वृद्धि का लाभ होता है। पूरे दिन उपवास/फलाहार रखा जाता है और रात को पारण के बाद दान‑पुण्य, विशेषकर सफेद वस्त्र, दूध, चीनी, खीर आदिके दान करने को फलदायी कहा गया है। इससे न केवल व्रत का पुण्य बढ़ता है बल्कि ग्रहों की अशांति भी कम होती है। विशेषकर यदि शुक्र प्रदोष व्रत हो, तो काले वस्त्र, कटु/अम्ल भोजन, झगड़ा आदि से परहेज करने की परंपरा है, क्योंकि ऐसा मानना है कि इस प्रकार का व्यवहार शुभ फल को प्रभावित कर सकता है। कुछ पुराणिक परंपराओं में लाल गुलाब के पुष्पों को शिवजी को अर्पित करना शुभ माना जाता है, विशेषकर दाम्पत्य जीवन को मधुर व सौहार्दपूर्ण बनाने के लिए।

बहुत समय पहले एक नगर में तीन गहरे मित्र रहते थे, एक राजकुमार, दूसरा ब्राह्मण पुत्र और तीसरा धनिक (सेठ) का पुत्र। राजकुमार और ब्राह्मण कुमार के विवाह हो चुके थे, जबकि सेठ के पुत्र का विवाह हो जाने के बाद भी गौना (पत्नी को ससुराल लाना) नहीं हुआ था। एक दिन तीनों मित्र आपस में बैठकर स्त्रियों की चर्चा कर रहे थे। तभी ब्राह्मण पुत्र बोल बैठा कि “जिस घर में स्त्री नहीं होती, वहाँ भूतों का डेरा लगता है।” यह बात सुनते ही सेठ का पुत्र दुखी हो गया और उसने तुरंत अपनी पत्नी को ससुराल लाने का निश्चय किया।

तीनों मित्र अपने‑अपने घरों को लौटे, लेकिन रास्ते में डाकुओं ने उन्हें घेर लिया और उनका सारा धन लूट लिया। ब्राह्मण पुत्र और राजकुमार दूसरी मुसीबतों से लड़ते‑लड़ते घर वापस पहुँचे, लेकिन सेठ पुत्र को रास्ते में साँप ने काट लिया। उसकी हालत गंभीर हो गई और लोगों को कहा गया कि वह तीन दिन में मर जाएगा। यह समाचार जब ब्राह्मण पुत्र को मिला तो उसने सेठ पुत्र के माता‑पिता को शुक्र प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने श्रद्धा‑भक्ति से यह व्रत रखा और भगवान शिव तथा माता पार्वती की पूजा की।

जैसे‑जैसे व्रत का पालन हुआ और प्रदोष काल (शाम के समय) में शिवपूजा हुई, सेठ के पुत्र का साँप का विष धीरे‑धीरे समाप्त होने लगा और वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया। इसके बाद सबने देखा कि जीवन की सभी बाधाएँ दूर हो गईं, सुख‑समृद्धि वापस लौटी और भगवान शिव की कृपा प्राप्त हुई। इसलिए कहा जाता है कि शुक्र प्रदोष व्रत को श्रद्धा से रखने से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं, मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख‑समृद्धि आती है।

यह कथा हमें सिखाती है कि प्रदोष व्रत शिव‑पार्वती की कृपा पाने और जीवन की कठिनाइयाँ मिटाने का महत्वपूर्ण उपवास है, खासकर जब त्रयोदशी तिथि शुक्रवार के दिन आती है, तब इसे शुक्र प्रदोष व्रत कहा जाता है और इसका फल और भी उत्तम माना जाता है।

शुक्र प्रदोष व्रत को विशेष रूप से विवाह, पारिवारिक जीवन और सौभाग्य जैसी इच्छाओं के पूर्ति के लिए शुभ माना जाता है। शिवजी और माता पार्वती की आराधना से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, शांति और वैवाहिक सुख‑समृद्धि की प्राप्ति होती है। भक्त मानते हैं कि प्रदोष व्रत से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों के हर प्रकार के दुख और कष्टों का नाश करते हैं।

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