Operation Lion’s Roar नामक सैन्य अभियान के तहत इज़राइल‑अमेरिका ने ईरान के कई हिस्सों पर हवाई हमले किए

Operation Lion’s Roar

ईज़राइल और ईरान के बीच वर्तमान युद्ध (Israel-Iran War) एक बेहद तीव्र, बहु-देशीय और लगातार बढ़ती हुई सैन्य टकराव स्थिति है जो 28 फरवरी 2026 को शुरू हुई जब संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर एक बड़े पैमाने पर सह-समन्वित सैन्य हमला किया, जिसे अमेरिका ने ओपरेशन एपिक फ्यूरी और इज़राइल ने Operation Lion’s Roar (शेर का गर्जन) नाम दिया। इस हमले में ईरान के कई सैन्य ठिकानों, मिसाइल और वायु रक्षा प्रणालियों, और महत्वपूर्ण नेतृत्व सुविधाओं को निशाना बनाया गया और इज़रान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत कई शीर्ष कमांडरों को मार गिराने का दावा किया गया, जिससे ईरान में नेतृत्व संकट पैदा हो गया है। इसके जवाब में ईरान ने दर्जनों बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन इज़राइल, अमेरिकी सैन्य अड्डों और अन्य खाड़ी देशों की ओर दागे, जिससे इज़राइल ने राज्य आपातकाल घोषित किया, स्कूल और सार्वजनिक स्थल बंद किए, अस्पतालों को भूमिगत स्थानों में स्थानांतरित किया और हजारों रिज़र्व सैनिकों को बुलाया। मिसाइल हमलों के कारण इज़राइल में नागरिक चोट-चपेटों और नुकसान की रिपोर्टें आई हैं, फिर भी देश के वायु रक्षा सिस्टम (Iron Dome) ने कई हमलों को रोकने में सफलता दिखाई। युद्ध का प्रभाव केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है; इसने वैश्विक तेल-ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है और कच्चे तेल के दामों में उतार-चढ़ाव और वायुदोलन मार्गों पर बाधाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में रद्दीकरण और उच्च लागत देखी जा रही है। ईरान में इंटरनेट सेवाएं भी लगभग पूरी तरह बाधित हो गई हैं और खाड़ी में भारतीय आदि प्रवासियों के लिए जोखिम बढ़ गया है। इस पूरे संघर्ष को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चेतावनी, आपात बैठकें और कूटनीतिक दबाव बढ़ रहे हैं, जबकि ईरान और इज़राइल दोनों ही अपनी-अपनी सैन्य क्षमताओं का उपयोग जारी रख रहे हैं। स्थिति बेहद अस्थिर है और भविष्य में संघर्ष के बढ़ने या कूटनीतिक समाधान की दिशा में आंदोलन दोनों ही संभव हैं।

भारत को इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध से कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा सुरक्षा को लेकर है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का आयात करता है और मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ने से तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, जिससे पेट्रोल-डीजल महंगा होता है और महंगाई पर दबाव बढ़ता है। दूसरी बड़ी समस्या समुद्री व्यापार मार्गों की है, खाड़ी क्षेत्र और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते भारत का बड़ा व्यापार गुजरता है; यदि वहां सैन्य टकराव बढ़ता है तो शिपिंग लागत, बीमा प्रीमियम और सप्लाई चेन बाधित हो सकती है। तीसरा, खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और संभावित निकासी का मुद्दा महत्वपूर्ण है। चौथा, भारत के दोनों देशों से अच्छे संबंध हैं—इज़राइल से रक्षा और तकनीक सहयोग तथा ईरान से ऊर्जा और चाबहार बंदरगाह जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट—ऐसे में कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसके अलावा, वैश्विक बाजारों में अस्थिरता, रुपये पर दबाव और शेयर बाजार में गिरावट जैसी आर्थिक प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं। इसलिए यह संघर्ष भारत के लिए सीधे युद्ध का खतरा नहीं बल्कि आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक दबाव का कारण बनता है।

ईज़राइल और ईरान के बीच हुए हालिया युद्ध (विशेष रूप से जून 2025 में 12-दिन का संघर्ष) में दोनों देशों को गंभीर नुकसान और भारी मानवीय लागत का सामना करना पड़ा। संयुक्त रिपोर्टों के अनुसार, ईरान में इस युद्ध के दौरान लगभग 1,190 लोग मारे गए और लगभग 4,400 से अधिक घायल हुए, जिसमें नागरिक और सैन्य दोनों शामिल हैं; कई प्रांतों में घरों, अस्पतालों और बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुँचा। ईरानी स्वास्थ्य मंत्रालय और स्वतंत्र मानवाधिकार समूहों के आंकड़े बताते हैं कि हज़ार से अधिक लोगों की मौतें हुईं और हजारों लोग गंभीर रूप से घायल हुए, साथ ही कई नागरिक विस्थापित हुए।  दूसरी ओर, ईज़राइल में भी नुकसान हुआ, जहां करीब 28 से 30 लोग मारे गए और हज़ारों घायल हुए, और मिसाइल हमलों से घरों, इन्फ्रास्ट्रक्चर एवं अस्पतालों को नुकसान पहुँचा। इस युद्ध से घरेलू संपत्ति, औद्योगिक सुविधाएँ और वैज्ञानिक संस्थान भी लक्षित हुए, जिससे आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भी गहरे रहे।  इन आंकड़ों के अलावा, हाल के 2026 के संघर्ष में भी ईरान में संयुक्त यूएस-इज़रायली हमलों के कारण अब तक 200 से अधिक नागरिकों की मौत और 700 से अधिक घायल होने की रिपोर्टें आई हैं, और हिंसा, विस्थापन और विनाश की खबरें जारी हैं। इस तरह दोनों देशों में मानवीय, आर्थिक और भौतिक नुकसान बहुत बड़ा रहा है, और आम लोगों तथा महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर इसका गंभीर प्रभाव दिख रहा है।

हाल ही में ईरान ने इज़रायल-अमेरिका के हमलों के जवाब में खाड़ी क्षेत्र में अपने ड्रोन और मिसाइल हमले शुरू किए, जिनमें से कुछ दुबई और UAE के अन्य हिस्सों तक पहुँचे हैं। इस हमले के दौरान दुबई में ड्रोन या उसके मलबे के गिरने से कुछ स्थानों पर विस्फोट, आग और धुएँ का गुबार देखा गया, जिससे स्थानीय लोगों में अफरातफरी फैल गई।

विशेषकर ये घटनाएँ सामने आई हैं:

  • दुबई के बुर्ज अल अरब होटल के पास ड्रोन के मलबे के गिरने से आग लगी और धुआँ उठता दिखा। स्थानीय प्रशासन ने इसे नियंत्रित किया।
  • दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे (DXB) के टर्मिनल बिल्डिंग को भी मिसाइल या ड्रोन मलबे से थोड़ा नुकसान पहुँचने और कुछ कर्मचारियों के ज़ख़्मी होने की रिपोर्टें हैं।
  • पाम जुमेराह के एक इलाके में धमाके की आवाज़ें और वीडियो वायरल हुए, जिनमें संभावित ड्रोन गिरने का दावा है (हालांकि कुछ मामलों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है)।

ये हमले ईरान-इज़राइल/अमेरिका संघर्ष के विस्तार का हिस्सा माने जा रहे हैं, जहाँ ईरान ने खाड़ी के देशों में मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं और UAE की वायु रक्षा प्रणाली ने कई को रोक लिया है, लेकिन कुछ मलबा और वाहनों को नुकसान पहुँचा है। यह स्थिति बहुत तेज़ी से बदल रही है, और स्थानीय अधिकारियों द्वारा जारी आधिकारिक घोषणाओं पर ही भरोसा करना ज़रूरी है क्योंकि सोशल मीडिया पर कई वायरल वीडियो कुछ झूठी या पुरानी सामग्री भी शामिल हो सकते हैं।

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