श्रीहरि की कृपा बरसाने वाली पावन ‘योगिनी एकादशी’

एकादशी

सनातन धर्म में एकादशी व्रत का बहुत अधिक आध्यात्मिक महत्व माना गया है। हर वर्ष आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को योगिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाली मानी गई है। इस पवित्र दिन पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसा विश्वास है कि जो भी भक्त इस दिन सच्चे मन से उपवास रखता है, उसे जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है और आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है। कई बार तिथियों के घटने-बढ़ने या वैष्णव परंपरा के अनुसार इस व्रत को दो अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है। सामान्य गृहस्थ जन जिस दिन व्रत रखते हैं, उसके अगले दिन संन्यासी, वैष्णव समुदाय और मोक्ष की कामना रखने वाले श्रद्धालु गौण योगिनी एकादशी का व्रत रखते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गौण एकादशी का व्रत रखना बेहद श्रेष्ठ और सीधे वैकुंठ धाम की प्राप्ति कराने वाला माना गया है। योगिनी एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना की जाती है। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य मन, वचन और कर्म की शुद्धि है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को गंभीर से गंभीर शारीरिक रोगों और त्वचा संबंधी कष्टों से मुक्ति मिलती है। 

योगिनी एकादशी और गौण योगिनी एकादशी की तिथियां इस प्रकार हैं:

  • योगिनी एकादशी (गृहस्थों के लिए): 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को रखी जाएगी। सामान्य तौर पर परिवार और गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग इसी दिन व्रत रखेंगे।

  • गौण योगिनी एकादशी (वैष्णव/संन्यासियों के लिए): 11 जुलाई 2026, शनिवार को रखी जाएगी। वैष्णव संप्रदाय, संन्यासी और मोक्ष की कामना रखने वाले श्रद्धालु इस दिन व्रत रखेंगे।

एकादशी तिथि की शुरुआत 10 जुलाई 2026 को सुबह 05:44 बजे से होगी और इसका समापन 11 जुलाई 2026 को सुबह 04:30 बजे होगा। सूर्योदय की तिथि और वैष्णव नियमों के कारण ये दोनों व्रत अलग-अलग दिन रखे जा रहे हैं।

पूजा विधि:

योगिनी एकादशी और गौण योगिनी एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए बेहद सरल और सात्विक पूजा विधि अपनाई जाती है। व्रत के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की सफाई करें और पवित्र नदी या घर पर ही गंगाजल मिले पानी से स्नान करें। इसके बाद स्वच्छ या पीले रंग के वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु के समक्ष हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें। घर के मंदिर में एक छोटी चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद भगवान को गंगाजल से स्नान कराएं और उन्हें पीले चंदन का तिलक लगाएं।

इसके बाद श्रीहरि को पीले फूल, ऋतु फल, धूप, और दीपक अर्पित करें। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) का होना अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना वे भोग स्वीकार नहीं करते हैं; इसलिए उन्हें पंचामृत और सात्विक मिष्ठान का भोग लगाते समय तुलसी दल जरूर रखें। इसके बाद शुद्ध घी का दीपक जलाकर योगिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। पूजा के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का निरंतर मानसिक जाप करते रहें और अंत में भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की आरती उतारें। शाम के समय भी भगवान के सामने दीपक जलाकर आरती करें और अगले दिन (द्वादशी को) शुभ मुहूर्त में ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देकर ही अपना व्रत खोलें (पारण करें)।

व्रत का समापन यानी पारण अगले दिन (द्वादशी तिथि को) शुभ मुहूर्त में किया जाता है। गौण योगिनी एकादशी के पारण के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इस दिन ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को अन्न, जल, छाता, या वस्त्र दान करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य फल प्राप्त होता है। यह पावन व्रत न केवल हमारे संचित बुरे कर्मों का नाश करता है, बल्कि जीवन में सकारात्मकता, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति का संचार भी करता है।

योगिनी एकादशी की पौराणिक कथा:

पद्म पुराण में वर्णित योगिनी एकादशी की कथा के अनुसार, स्वर्गलोक की अलकापुरी नगरी में राजा कुबेर रहा करते थे, जो भगवान शिव के परम भक्त थे। कुबेर हर दिन शिवजी की पूजा किया करते थे। उनकी पूजा के लिए मानसरोवर से दिव्य और ताजे फूल लाने का काम ‘हेम माली’ नाम का एक यक्ष करता था। हेम माली अपनी पत्नी ‘विशालाक्षी’ से अगाध प्रेम करता था और वह रूपसी स्त्रियों में अत्यंत सुंदर थी। एक दिन, हमेशा की तरह हेम माली मानसरोवर से सुंदर फूल लेकर आया, लेकिन राजा कुबेर को देने के बजाय वह अपनी पत्नी के प्रेम-पाश में बंधकर अपने घर पर ही रुक गया और उसके साथ समय बिताने लगा। उधर, राजा कुबेर दोपहर तक भगवान शिव की पूजा के लिए फूलों का इंतजार करते रहे। जब पूजा का समय बीत गया और हेम माली नहीं आया, तो राजा कुबेर को बहुत क्रोध आया। उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे जाकर पता लगाएं कि हेम माली अभी तक फूल लेकर क्यों नहीं आया। सैनिकों ने जाकर देखा और कुबेर को आकर बताया, “हे राजन! हेम माली तो अपने घर पर अपनी पत्नी के साथ आमोद-प्रमोद में व्यस्त है।” यह सुनकर कुबेर के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने तुरंत हेम माली को दरबार में हाजिर करने का हुक्म दिया।

हेम माली भय से कांपता हुआ राजा कुबेर के सामने उपस्थित हुआ। क्रोध से लाल-पीले कुबेर ने उसे फटकारते हुए कहा, “हे पापी! तूने अपनी काम-वासना के कारण मेरे परम आराध्य देवों के देव महादेव की पूजा का अपमान किया है। मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू स्त्री के वियोग का दुख भोगेगा और मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाकर कुष्ठ (कोढ़) रोग से पीड़ित होगा।” कुबेर के शाप देते ही हेम माली उसी क्षण स्वर्ग से सीधे पृथ्वी पर आ गिरा। शाप के प्रभाव से उसका पूरा शरीर भयानक कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गया और उसकी त्वचा गलने लगी। वह अपनी प्रिय पत्नी से भी बिछड़ गया। पृथ्वी पर आकर उसने कई वर्षों तक भूख, प्यास और असहनीय शारीरिक पीड़ा का सामना किया। वह रात-दिन तड़पता रहता, लेकिन भगवान शिव की पूजा के प्रभाव से उसकी याददाश्त नष्ट नहीं हुई थी, इसलिए वह अपने पूर्व जन्म के पाप पर लगातार पछताता रहता था।

एक दिन, भटकते-भटकते हेम माली हिमालय पर्वत पर पहुँच गया, जहाँ महान और त्रिकालदर्शी ऋषि मार्कंडेय का आश्रम था। हेम माली उनके चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए अपनी पूरी व्यथा सुनाई। हेम माली की दयनीय स्थिति देखकर और उसके भीतर सच्चा पछतावा पाकर ऋषि मार्कंडेय को उस पर दया आ गई। ऋषि ने कहा, “हे यक्ष! तूने अपनी भूल स्वीकार कर ली है। मैं तुझे एक ऐसा उपाय बताता हूँ जिससे तेरे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। तू आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली ‘योगिनी एकादशी’ का पूरे नियम और सच्ची श्रद्धा के साथ व्रत कर। इसके प्रभाव से तेरे सभी पाप और शाप नष्ट हो जाएंगे।” हेम माली ने ऋषि मार्कंडेय के चरणों में शीश नवाया और उनके कहे अनुसार आषाढ़ कृष्ण एकादशी (योगिनी एकादशी) का विधि-विधान से, निर्जला और फलाहार रहकर उपवास किया, भगवान विष्णु की पूजा की और रात भर कीर्तन किया। इस पावन व्रत के प्रभाव से हेम माली का भयानक कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया और उसकी त्वचा सोने जैसी चमकने लगी। वह वापस अपने दिव्य यक्ष स्वरूप में आ गया। इसके बाद वह स्वर्गलोक लौट गया और अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ पुनः सुखपूर्वक रहने लगा।

कथा का संदेश:

शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हुए कहा था कि जो भी मनुष्य योगिनी एकादशी की इस कथा को पढ़ता या सुनता है, उसे 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य फल मिलता है और जीवन के अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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