प्रद्युम्न चतुर्थी: संतान सुख की कामना और विघ्नहर्ता गणेश की असीम कृपा का महापर्व

प्रद्युम्न चतुर्थी

हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। इसी क्रम में, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को ‘प्रद्युम्न चतुर्थी’ के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह अत्यंत पवित्र दिन भगवान श्री कृष्ण और माता रुक्मिणी के पुत्र ‘प्रद्युम्न’ (जिन्हें कामदेव का अवतार माना जाता है) के जन्म और उनके लोक कल्याणकारी चरित्र से जुड़ा हुआ है। इस शुभ अवसर पर भगवान गणेश के संकट हरने वाले रूप की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विघ्नहर्ता की आराधना करने से संतान को दीर्घायु, अच्छा स्वास्थ्य और तीक्ष्ण बुद्धि की प्राप्ति होती है, साथ ही परिवार के सभी रुके हुए कार्य बिना किसी बाधा के पूरे हो जाते हैं। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि हमारे धार्मिक और आध्यात्मिक कैलेंडर में एक बेहद अनूठा और फलदायी स्थान रखती है। इसे ‘प्रद्युम्न चतुर्थी’ या ‘बहुला चतुर्थी’ के आस-पास मनाए जाने वाले पर्वों के रूप में देखा जाता है। यह पावन दिन न केवल भगवान श्री गणेश की आराधना के लिए समर्पित है, बल्कि यह माता-पिता द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उन्नति और खुशहाली के लिए रखे जाने वाले सबसे कठिन और महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना गया है।

प्रद्युम्न चतुर्थी पूजा विधि:

प्रद्युम्न चतुर्थी की पूजा विधि सुबह सूर्योदय से प्रारंभ होकर रात में चंद्र दर्शन के साथ संपन्न होती है। इस पावन दिन श्रद्धालु सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो लाल या पीले रंग के कपड़े) धारण करते हैं और हाथ में जल, अक्षत व पुष्प लेकर भगवान गणेश का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेते हैं। इसके बाद घर के ईशान कोण या पूजा घर में एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित किया जाता है और साथ ही भगवान श्री कृष्ण व माता रुक्मिणी की तस्वीर भी रखी जाती है। फिर विघ्नहर्ता के समक्ष शुद्ध घी का दीपक और धूप जलाकर उन्हें रोली, कुमकुम व चंदन का तिलक लगाया जाता है और बाप्पा की प्रिय दूर्वा व लाल फूल अर्पित किए जाते हैं। इस दिन गणेश जी को विशेष रूप से तिल और गुड़ के लड्डू या मोदक का भोग लगाया जाता है, और यदि यह उपलब्ध न हो तो बूंदी के लड्डू या मौसमी फल भी चढ़ाए जा सकते हैं। भोग अर्पण के बाद हाथ में गंगाजल या फूल लेकर प्रद्युम्न चतुर्थी की पौराणिक व्रत कथा श्रद्धापूर्वक सुनी या पढ़ी जाती है, जिसके बाद बाप्पा के मंत्रों या संकट नाशन स्तोत्र का पाठ करके कपूर से आरती की जाती है। दिनभर अपनी क्षमता अनुसार फलाहार या निर्जला व्रत रखने के बाद, रात में जब चंद्रोदय होता है, तब चांदी या तांबे के लोटे में कच्चा दूध, गंगाजल, चंदन और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। अंत में चंद्र देव को प्रणाम कर और भगवान गणेश का आशीर्वाद लेकर प्रसाद खाकर व्रत का पारण किया जाता है; साथ ही इस शुभ अवसर पर बच्चों को भी आरती में शामिल करना और पूजा के बाद भगवान के चरणों का तिलक उनके माथे पर लगाना उनके बौद्धिक विकास और सुरक्षा के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।

प्रद्युम्न चतुर्थी की पौराणिक कथा:

पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण और देवी रुक्मिणी के घर एक परम तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम ‘प्रद्युम्न’ रखा गया। प्रद्युम्न वास्तव में साक्षात कामदेव के अवतार थे। जब प्रद्युम्न मात्र छह दिन के थे, तब ज्योतिषियों की भविष्यवाणी से डरकर ‘शंबरासुर’ नाम का एक शक्तिशाली और क्रूर राक्षस उनका अपहरण कर ले गया। भविष्यवाणी के अनुसार, शंबरासुर का वध श्री कृष्ण के इसी पुत्र के हाथों होना तय था। अपने अंत के डर से शंबरासुर ने उस नवजात शिशु को गहरे समुद्र में फेंक दिया। समुद्र में एक विशाल मछली ने प्रद्युम्न को निगल लिया, लेकिन भगवान विष्णु की माया से वे मछली के पेट में भी सुरक्षित रहे।

वह मछली संयोग से मछुआरों द्वारा पकड़ी गई और शंबरासुर की रसोई में ही पहुँच गई। जब शंबरासुर की दासी और मायावी शक्तियों की ज्ञाता ‘मायावती’ (जो पूर्व जन्म में कामदेव की पत्नी रति थीं) ने मछली का पेट चीरा, तो उसमें से एक बेहद सुंदर और दिव्य बालक निकला। मायावती ने अपनी दिव्य दृष्टि से तुरंत पहचान लिया कि यह भगवान श्री कृष्ण के पुत्र और उनके पति कामदेव हैं। उन्होंने शंबरासुर से छुपाकर उस बालक का पालन-पोषण किया और उन्हें सभी अस्त्र-शस्त्र और मायावी विधाओं में निपुण बनाया। इधर, प्रद्युम्न के गायब होने से माता रुक्मिणी और भगवान श्री कृष्ण गहरे शोक में डूब गए थे। अपने पुत्र की रक्षा और उसकी सकुशल वापसी के लिए माता रुक्मिणी ने नारद मुनी के परामर्श पर भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकटहर्ता भगवान गणेश का अत्यंत कठिन व्रत किया। उन्होंने पूरे दिन निराहार रहकर शाम को विघ्नहर्ता की पूजा की और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर बाप्पा से अपने पुत्र की लंबी आयु और सुरक्षा का वरदान मांगा।

माता के इस व्रत और भक्ति के प्रभाव से उधर प्रद्युम्न युवा हुए और उन्होंने अपनी शक्तियों से दुष्ट शंबरासुर का वध कर दिया। शंबरासुर का अंत करने के बाद प्रद्युम्न अपनी पत्नी मायावती के साथ सकुशल द्वारका अपनी माता रुक्मिणी और पिता श्री कृष्ण के पास लौट आए। अपने मृत समझे गए पुत्र को जीवित और विजयी देखकर माता रुक्मिणी के आनंद की सीमा न रही। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि जो भी माताएं भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के सम्मुख इस कथा को सुनती हैं या पढ़ती हैं, उनके बच्चों पर आने वाले सभी अदृश्य और प्राणघातक संकट टल जाते हैं। बाप्पा उनकी संतान को लंबी आयु, शौर्य और विजय का वरदान देते हैं।

संतान के लिए रक्षा कवच है यह व्रत:

भारतीय परिवारों में माताओं के लिए इस व्रत का बहुत अधिक महत्व है। माना जाता है कि जो भी माताएं इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ भगवान गणेश और संकट नाशन स्तोत्र का पाठ करती हैं, उनकी संतान को करियर, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलता मिलती है। यह व्रत बच्चों के भीतर की नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर उनके बौद्धिक विकास में सहायक होता है। यदि परिवार में लंबे समय से कोई बीमार है या किसी काम में बार-बार अड़चनें आ रही हैं, तो इस दिन किया गया दान-पुण्य उन दोषों को शांत करता है।

चंद्रमा को अर्घ्य देने का विशेष नियम:

सभी संकष्टी और कृष्ण पक्ष की चतुर्थियों की तरह प्रद्युम्न चतुर्थी में भी चंद्र दर्शन और उन्हें अर्घ्य देने का विशेष विधान है। चूंकि भाद्रपद के महीने में मौसम अक्सर बादलों से घिरा रहता है, इसलिए भक्त बड़ी उत्सुकता से आसमान में चंद्रमा के निकलने का इंतजार करते हैं। चांदी के पात्र या लोटे में दूध, गंगाजल, चंदन और शहद मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। ऐसा करने से कुंडली में चंद्र दोष दूर होता है और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

प्रद्युम्न चतुर्थी का यह पावन व्रत हमें सिखाता है कि माता-पिता का त्याग और भगवान की भक्ति मिलकर किसी भी बड़ी आपदा को टाल सकते हैं। यह त्योहार हमारे पारिवारिक बंधनों को और मजबूत बनाता है। इस शुभ तिथि पर भगवान गणेश और श्री कृष्ण आप सभी की संतानों को लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि का वरदान दें। आप सभी को प्रद्युम्न चतुर्थी की मंगलमय शुभकामनाएं

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