भारत में मौसम का मिजाज इस समय एक बेहद दिलचस्प मोड़ पर है। एक तरफ जहां पूरा देश भीषण गर्मी और तपते सूरज को अलविदा कहने के लिए बेताब है, वहीं दूसरी तरफ मानसून की दस्तक ने लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरनी शुरू कर दी है। मई के आखिरी हफ़्तों और जून की शुरुआत में केरल के तट से टकराने के बाद, दक्षिण-पश्चिमी मानसून (Southwest Monsoon) अब धीरे-धीरे देश के बाकी हिस्सों की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, इस साल अल नीनो (El Niño) के असर के कारण मानसून की चाल थोड़ी धीमी और सुस्त जरूर देखी जा रही है, लेकिन इसके बावजूद देश के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में हो रही रिमझिम बारिश ने मौसम को सुहाना बना दिया है।
चिलचिलाती धूप, पसीने से तरबतर दिन और वो लू के थपेड़े आखिरकार अब भारत में साल के सबसे कड़े मौसम यानी ‘भीषण गर्मियों’ को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। जून का महीना अपने साथ न सिर्फ कैलेंडर का नया पन्ना लाता है, बल्कि आसमान में उमड़ते-घुमड़ते काले बादलों के रूप में एक बड़ी राहत भी लेकर आता है। भारत के कोने-कोने में इस समय लोग आसमान की तरफ नजरें टिकाए बैठे हैं, क्योंकि देश की धड़कन कहा जाने वाला ‘मानसून’ अपनी धीमी लेकिन जादुई चाल से आगे बढ़ रहा है।
गर्मियों की विदाई: जब तपती धरती को मिली राहत
मई के महीने में उत्तर से लेकर मध्य भारत तक ने रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का सामना किया है। पारा 45 डिग्री के पार जाना और झुलसाने वाली हवाओं ने हर किसी को बेहाल कर दिया था। लेकिन अब, मौसम के तेवर बदल रहे हैं। शाम के समय चलने वाली ठंडी हवाएं और आसमान में छाने वाली धुंध इस बात का साफ संकेत हैं कि गर्मियों का सफर अब खत्म होने की ओर है। एयर कंडीशनर और कूलरों की गड़गड़ाहट के बीच, अब लोग अपने घरों की खिड़कियां खोलकर मिट्टी की उस सोंधी खुशबू का इंतजार कर रहे हैं, जो पहली बारिश के साथ ही फिजां में घुल जाती है। यह गर्मियों की आधिकारिक विदाई का वह दौर है, जिसका इंतजार हर भारतीय को बेसब्री से होता है।
मानसून का आगमन: केरल से शुरू हुआ खुशियों का सफर
इस साल भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक, मानसून ने जून की शुरुआत में केरल के रास्ते भारत की मुख्य भूमि पर कदम रख दिया है। हालांकि, इस बार ‘अल नीनो’ (El Niño) के प्रभाव के चलते मानसून की रफ़्तार थोड़ी धीमी है और कुछ इलाकों (जैसे मुंबई और पश्चिमी तट) में यह अपनी तय तारीख से थोड़ा संभलकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन दक्षिण भारत के पहाड़ी इलाकों, पूर्वोत्तर के राज्यों और बिहार-झारखंड के कुछ हिस्सों में प्री-मानसून और शुरुआती मानसूनी बौछारों ने मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल दिया है। बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली की चमक के साथ हो रही यह बारिश केवल तापमान को ही कम नहीं कर रही, बल्कि महीनों से प्यासी धरती को भी नया जीवन दे रही है।
उत्तर भारत में ‘वेस्टर्न डिस्टर्बेंस’ और प्री-मानसून का तड़का
भले ही दिल्ली-एनसीआर और उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानों तक मुख्य मानसून को पहुंचने में अभी कुछ दिनों का समय और लगेगा, लेकिन ‘वेस्टर्न डिस्टर्बेंस’ (पश्चिमी विक्षोभ) के कारण धूल भरी आंधियों और अचानक होने वाली तेज बारिश ने यहां भी गर्मी के तेवरों को ढीला कर दिया है। शाम के समय आसमान का रंग बदलना, ठंडी हवाओं का चलना और बूंदाबांदी होना इस बात का सबूत है कि मानसून की सेना आगे बढ़ रही है। यह वो समय है जब चाय और पकौड़ों की डिमांड अचानक बढ़ जाती है और लोग शाम को छतों पर आकर मौसम का लुत्फ उठाने लगते हैं।
खेती और जीवन का नया चक्र
भारत में मानसून सिर्फ एक मौसम नहीं, बल्कि एक त्योहार है। हमारी खेती, नदियां, जलाशय और देश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक इसी चार महीने की बारिश (जून से सितंबर) पर निर्भर करती है। भले ही इस साल बारिश सामान्य से थोड़ी कम रहने का अनुमान है, फिर भी किसानों ने अपने खेतों को खरीफ की फसलों के लिए तैयार करना शुरू कर दिया है। जैसे ही बारिश की बूंदें खेतों पर गिरती हैं, ग्रामीण भारत में एक नई ऊर्जा और उम्मीद का संचार हो जाता है।
गर्मियों को ‘बाय-बाय’ कहना और मानसून का स्वागत करना, भारत के सबसे खूबसूरत अनुभवों में से एक है। यह बदलाव हमें सिखाता है कि कितनी भी कड़ी धूप क्यों न हो, राहत की बौछारें आती जरूर हैं। तो अपनी छतरियां तैयार रखिए, खिड़की के पास अपनी जगह पक्की कर लीजिए और चाय की चुस्कियों के साथ इस बदलते मौसम का स्वागत कीजिए!