अमान्त हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार, फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को भालचन्द्र संकष्टी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणेश के भालचन्द्र रूप की पूजा-अर्चना की जाती है। भालचन्द्र गणेश अर्थात् वे गणेश जी जिनके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित है। भगवान शिव को भी भालचन्द्र के नाम से जाना जाता है। धर्म ग्रन्थों के अनुसार, जीवन में आने वाले घोर संकटों के निवारण हेतु भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी का व्रत एक अमोघ उपाय है। भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी 6 मार्च, शुक्रवार को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार इस दिन चतुर्थी तिथि लगभग शाम से शुरू होकर अगले दिन तक रहती है और चंद्रोदय का समय लगभग रात 9:30 बजे के आसपास बताया गया है, इसलिए उसी समय चंद्र दर्शन करके भगवान गणेश की पूजा करने का विशेष महत्व होता है। यह व्रत 4 वर्ष अथवा 13 वर्ष के लिये किया जाता है, इस अवधि के उपरान्त व्रत का उद्यापन करना चाहिये। इस व्रत का पालन करने हेतु चन्द्रोदयव्यापिनी चतुर्थी तिथि का चयन किया जाता है। यदि दो दिन चन्द्रोदयव्यापिनी चतुर्थी हो, तो प्रथम दिवस को व्रत हेतु चुनना चाहिये। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने से जीवन में आने वाले सभी संकट, बाधाएं और कष्ट दूर होते हैं तथा बुद्धि, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से चंद्रदर्शन के बाद ही पूर्ण माना जाता है और भक्त रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं।
इस व्रत का विशेष महत्व माना गया है क्योंकि भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियम के साथ व्रत रखने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और परिवार में सुख-शांति तथा समृद्धि आती है। कई स्थानों पर लोग इस दिन गणेश मंदिरों में जाकर विशेष पूजा करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और प्रसाद वितरित करते हैं। इसी कारण भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी को भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने वाला अत्यंत पवित्र और फलदायी व्रत माना जाता है। पूर्णिमा के उपरान्त आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं तथा अमावस्या के उपरान्त आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं।
भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि:
भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि बहुत श्रद्धा और नियम के साथ की जाती है। इस दिन व्रती सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करते हैं और साफ-सुथरे वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थल को शुद्ध करके भगवान भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित किया जाता है। पूजा की शुरुआत दीपक और धूप जलाकर की जाती है, फिर भगवान गणेश को फूल, दुर्वा (दूब घास), लाल चंदन, अक्षत, मोदक या लड्डू का भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद गणेश मंत्र, गणेश चालीसा और संकष्टी व्रत कथा का पाठ किया जाता है। इस दिन भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम के समय भगवान गणेश की पुनः पूजा करते हैं। संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा के दर्शन के बाद ही पूर्ण माना जाता है, इसलिए रात में चंद्रमा निकलने पर उसे अर्घ्य दिया जाता है और भगवान गणेश से जीवन के सभी संकट दूर करने की प्रार्थना की जाती है। अंत में प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस विधि से पूजा करने पर भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।
भालचन्द्र संकष्टी व्रत कथा:
पुराने समय की बात है, एक नगर में भालचन्द्र नामक ब्राह्मण रहता था। वह अत्यंत धर्मपरायण और ज्ञानशील था। एक बार उसने सुना कि भगवान गणेश की पूजा करने से सभी बाधाएँ दूर होती हैं और संकष्टी चतुर्थी के व्रत से विशेष लाभ मिलता है। भालचन्द्र ने संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत करने का निश्चय किया। उसने दिनभर उपवास रखा और शाम को चतुर्थी तिथि अनुसार चंद्र दर्शन किया। व्रत की कथा के अनुसार, जो व्यक्ति भालचन्द्र संकष्टी व्रत करता है, वह अपने जीवन की सभी कठिनाइयों और दोषों से मुक्त हो जाता है। कथा में बताया गया है कि भालचन्द्र ने इस व्रत को करने के बाद अपने परिवार और समाज में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त की। भगवान गणेश उसकी सभी मनोकामनाएँ पूरी करने में सहायक हुए और उसकी बुद्धि और कार्यक्षमता में वृद्धि हुई। इसलिए हर संकष्टी चतुर्थी को इस व्रत का पालन करने से मनोकामना सिद्धि, दोष निवारण और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।