विघ्नों का नाश करने वाली “विभुवन संकष्टी चतुर्थी”: जानें महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

संकष्टी चतुर्थी

सनातन धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूजनीय और ‘विघ्नहर्ता’ माना गया है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणपति जी की आराधना से ही होती है। वैसे तो हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है, लेकिन जब यह चतुर्थी अधिक मास (मलमास) में आती है, तो इसे ‘विभुवन संकष्टी चतुर्थी’ कहा जाता है। तीन साल में एक बार आने के कारण इस व्रत का धार्मिक महत्व और आध्यात्मिक ऊर्जा बहुत अधिक बढ़ जाती है। आइए इस ब्लॉग में जानते हैं विभुवन संकष्टी चतुर्थी का महत्व, शुभ मुहूर्त और इसकी विशेष पूजा विधि। ज्योतिष और आयुर्वेद के अनुसार, चंद्रमा हमारे मन और भावनाओं का कारक है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के समय चंद्रमा की ऊर्जा कमजोर होती है, जिससे मन में थोड़ी चंचलता या तनाव हो सकता है। जब हम इस दिन उपवास रखते हैं और भगवान गणेश (जो बुद्धि के देवता हैं) की आराधना करते हैं, तो हमारा मानसिक संतुलन बेहतर होता है और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है।

क्या है विभुवन संकष्टी चतुर्थी का अर्थ और महत्व?

‘संकष्टी’ शब्द का अर्थ है संकटों या कठिनाइयों से मुक्ति। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कृष्ण पक्ष की बारह चतुर्थियों पर भगवान गणेश के बारह अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है, जिनमें से एक रूप ‘विभुवन’ है। यह रूप दिव्य विस्तार और आध्यात्मिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।

हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जुड़ता है, जिसे हम ‘अधिक मास’ या ‘पुरुषोत्तम मास’ कहते हैं। अधिक मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को ही विभुवन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। ‘विभुवन’ का अर्थ है, ‘तीनों लोकों में व्याप्त’ या ‘तीनों लोकों को प्रकाश देने वाला’। इस दिन भगवान गणेश के इसी ब्रह्मांडीय और सर्वव्यापी रूप की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से कई जन्मों के पाप धूल जाते हैं और रुके हुए काम तेजी से बनने लगते हैं।

इस व्रत के मुख्य लाभ:

  • मानसिक शांति और स्पष्टता: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं और चंद्रमा मन के कारक हैं। इस व्रत में दोनों की पूजा से मानसिक चंचलता दूर होती है और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।

  • संकटों से मुक्ति: इस दिन पूरी निष्ठा से व्रत रखने पर जीवन में बार-बार आ रही बाधाएं और रुके हुए काम तेजी से पूरे होते हैं।

  • अधिक मास का पुण्य: अधिक मास को भगवान विष्णु का महीना (पुरुषोत्तम मास) भी माना जाता है, इसलिए इस दौरान गणेश जी की पूजा करने से दोगुना फल प्राप्त होता है।

शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का समय:

पंचांग के अनुसार, विभुवन संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रमा को अर्घ्य देने का विशेष महत्व होता है, इसलिए व्रत उसी दिन रखा जाता है जिस रात चतुर्थी तिथि में चंद्रोदय हो रहा हो।

  • विभुवन संकष्टी चतुर्थी तिथि: 3 जून, 2026 (बुधवार)

  • चतुर्थी तिथि का आरंभ: 3 जून, 2026 को रात 09:22 बजे से

  • चतुर्थी तिथि की समाप्ति: 4 जून, 2026 को रात 11:31 बजे तक

  • चंद्रोदय (Arghya Time) का समय: 3 जून की रात 10:04 बजे

विशेष संयोग: वर्ष 2026 में यह व्रत बुधवार के दिन पड़ रहा है, जो कि स्वयं भगवान गणेश का प्रिय दिन माना जाता है। इस वजह से इस व्रत का महत्व और भी ज्यादा बढ़ गया है।

पूजा की सरल और संपूर्ण विधि:

विभुवन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखने वाले जातकों को सुबह से लेकर रात को चंद्र दर्शन तक नियमों का पालन करना चाहिए:

  1. प्रातः काल की तैयारी: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ (संभव हो तो पीले या लाल रंग के) वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।

  2. पूजा स्थल की स्थापना: पूजा घर की सफाई करें। एक लकड़ी की चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

  3. गणपति का अभिषेक: प्रतिमा पर गंगाजल छिड़कें और पंचामृत से स्नान कराएं। उन्हें रोली, अक्षत, चंदन और मोदक/लड्डू का भोग लगाएं।

  4. दूर्वा अर्पित करें: गणेश जी को दूर्वा (दूब घास) अत्यंत प्रिय है। पूजा के दौरान उन्हें 21 दूर्वा की गांठें जरूर अर्पित करें।

  5. कथा और आरती: घी का दीपक जलाकर संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें और अंत में गणेश जी की आरती करें।

  6. इस मंत्र का 108 बार जाप करें, “वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥”

शाम की पूजा और चंद्र अर्घ्य नियम

दिनभर फलाहारी व्रत रखने के बाद, रात को जब चंद्रमा उदय हो (3 जून को रात 10:04 बजे), तब एक तांबे के लोटे में जल, थोड़ा सा दूध, चंदन और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें।

चंद्र देव से अपने परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें और इसके बाद भगवान गणेश को अर्पित किया गया प्रसाद (जैसे साबूदाना खीर, कुट्टू या आलू का सात्विक भोजन) ग्रहण कर अपना व्रत खोलें।

विभुवन संकष्टी चतुर्थी का यह दुर्लभ अवसर हमारे भीतर के तनाव, नकारात्मकता और जीवन की बाधाओं को दूर करने का एक बेहतरीन आध्यात्मिक मार्ग है। यदि आप भी जीवन में स्थिरता और सुख-समृद्धि चाहते हैं, तो इस बार पूरे विधि-विधान से बप्पा की आराधना जरूर करें।

                                                                                                                      बोलो गणपति बाप्पा मोरया!

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