धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद राज्यों में गर्माई राजनीति, हरजोत सिंह बैंस और मधु बंगारप्पा के इस्तीफे की उठी मांग

धर्मेंद्र प्रधान

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा 25 जुलाई 2026 को दिए गए इस्तीफे ने देश की राजनीति में एक ऐसा ‘डोमिनो इफेक्ट’ (असर की शृंखला) शुरू कर दिया है, जिसकी आंच अब राज्यों की प्रांतीय सरकारों तक पूरी तरह पहुंच चुकी है। राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा होने के बाद अब पंजाब और कर्नाटक जैसे राज्यों में विपक्ष और छात्र संगठनों ने आक्रामक रुख अपना लिया है। पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस और कर्नाटक के प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा मंत्री एस. मधु बंगारप्पा के खिलाफ सड़कों पर उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं और दोनों से तत्काल नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की मांग की जा रही है।

1. पंजाब में हरजोत सिंह बैंस के खिलाफ बढ़ता आक्रोश और जमीनी स्थिति

पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पिछले कुछ दिनों में काफी तेज हो गए हैं। राज्य में प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर छात्रों के बीच लंबे समय से नाराजगी पनप रही थी।

  • पेपर लीक और भर्ती में धांधली के आरोप: पंजाब में विभिन्न राज्यस्तरीय प्रशासनिक, पुलिस और शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में बार-बार हो रही गड़बड़ियों, पेपर लीक के दावों और परिणामों में देरी को लेकर अभ्यर्थियों में भारी असंतोष है।

  • विपक्षी दलों का चौतरफा हमला: पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के वरिष्ठ नेताओं ने सरकार पर सीधा निशाना साधा है। विपक्ष का तर्क है कि जब केंद्र में धर्मेंद्र प्रधान करोड़ों छात्रों के भविष्य की जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ सकते हैं, तो पंजाब में शिक्षा व्यवस्था की नाकामी की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान और शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे?

  • सड़कों पर छात्र संगठन: चंडीगढ़, पटियाला, लुधियाना और जालंधर जैसे प्रमुख शहरों में छात्र यूनियनों और युवा कांग्रेस/यूथ अकाली दल के कार्यकर्ताओं ने पुतले फूंके हैं और ‘शिक्षा मंत्री इस्तीफा दो’ के नारे लगाए हैं।

2. कर्नाटक में एस. मधु बंगारप्पा के खिलाफ प्रदर्शन और विवाद

दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के शिक्षा मंत्री एस. मधु बंगारप्पा भी इस समय गंभीर राजनीतिक और सामाजिक दबाव का सामना कर रहे हैं।

  • बोर्ड और प्रवेश परीक्षाओं में कुप्रबंधन: कर्नाटक राज्य परीक्षा एवं मूल्यांकन बोर्ड (KSEAB) तथा राज्य स्तरीय प्रवेश परीक्षाओं (KCET) में प्रश्नों की गलतियों, कृपांक (grace marks) के विवाद और नतीजों में हुई तकनीकी खामियों को लेकर छात्र और अभिभावक बेहद नाराज हैं।

  • भाजपा और जद(एस) की घेराबंदी: कर्नाटक के मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (सेक्युलर) ने बैंगलोर में बड़े पैमाने पर विरोध मार्च निकाला है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि मधु बंगारप्पा न केवल राज्य की परीक्षा प्रणाली को संभालने में विफल रहे हैं, बल्कि राष्ट्रीय नीट (NEET) विवाद पर भी उनका रवैया बेहद उदासीन और गैर-जिम्मेदाराना रहा है।

  • बैंगलोर और मैसूर में विरोध रैलियां: अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और अन्य स्थानीय छात्र संगठनों ने बैंगलोर के फ्रीडम पार्क में अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है, जिसमें शिक्षा मंत्री के तुरंत इस्तीफे की मांग की गई है।

प्रशासनिक और नीतिगत नतीजे

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने यह साबित कर दिया है कि भारत में अब शिक्षा और परीक्षा प्रणाली केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक वोट-बैंक और जन-आंदोलन का मुद्दा बन चुका है।

  1. जवाबदेही का नया मानदंड: केंद्र सरकार के मंत्री द्वारा पद छोड़े जाने के बाद अब किसी भी राज्य का शिक्षा मंत्री प्रशासनिक लापरवाही का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।

  2. राष्ट्रीय बनाम राज्यस्तरीय राजनीति: कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जो केंद्र में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रही थीं, अब अपने ही शासित राज्यों (कर्नाटक और पंजाब) में अपने मंत्रियों का बचाव करने के कारण रक्षात्मक मुद्रा में आ गई हैं।

  3. भविष्य की दिशा: यदि राज्यों में भी यह दबाव इसी तरह बना रहा, तो आने वाले दिनों में कई राज्य सरकारों को अपने शिक्षा विभागों में बड़े पैमाने पर फेरबदल और परीक्षा सुधार कानूनों को लागू करना पड़ेगा।

यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि भारत में छात्र आंदोलन अब केवल एक केंद्रीय मुद्दे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह देश के हर कोने में शिक्षा मंत्रियों और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही तय करने का एक व्यापक माध्यम बन चुका है।

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