सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अत्यधिक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है, जिसमें से ‘पुत्रदा एकादशी’ विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है। इस शुभ तिथि पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूर्ण विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, संसार के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु को एकादशी की तिथि सर्वाधिक प्रिय है, और उसमें भी पुत्रदा एकादशी का व्रत सर्वश्रेष्ठ कल्याणकारी माना गया है। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान सुख की प्राप्ति, संतान की दीर्घायु, उसके अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना है। सनातन परंपरा में माना जाता है कि पुत्र या पुत्री के बिना गृहस्थ जीवन अधूरा रहता है और वंश परंपरा आगे नहीं बढ़ पाती। ऐसे में जो दंपत्ति संतान हीनता के कष्ट से जूझ रहे हैं या जिनकी संतान के जीवन में बार-बार बाधाएं आ रही हैं, उनके लिए यह व्रत एक दिव्य वरदान की तरह काम करता है। पुत्रदा एकादशी का व्रत 23 अगस्त 2026, रविवार को रखा जाएगा। व्रत का पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को 24 अगस्त 2026 की सुबह 05:56 बजे से सुबह 08:31 बजे के बीच किसी जरूरतमंद को दान-दक्षिणा देने के बाद किया जाना चाहिए।
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से न केवल इस जन्म के पापों का नाश होता है, बल्कि पूर्व जन्म के बुरे कर्मों के प्रभाव (प्रारब्ध दोष) भी समाप्त हो जाते हैं, जिनके कारण संतान प्राप्ति में विघ्न आ रहे होते हैं। पद्म पुराण और ब्रह्मांड पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर को इस एकादशी का महात्म्य बताते हुए कहा था कि जो फल बड़े-बड़े यज्ञों, कठिन तपस्याओं और हज़ारों गोदानों से भी प्राप्त नहीं होता, वह केवल एक बार सच्चे मन से पुत्रदा एकादशी का उपवास रखने से मिल जाता है। यह व्रत माता-पिता को संतान सुख प्रदान करने के साथ-साथ संतान को गुणवान, संस्कारी और कुल का नाम रोशन करने वाला बनाता है।आध्यात्मिक दृष्टि से भी पुत्रदा एकादशी का विशेष महत्व है। एकादशी का मूल अर्थ अपनी दस इंद्रियों और मन को संयमित करना है। इस दिन निर्जला या फलाहार रहकर भगवान विष्णु की भक्ति करने से साधक का मन सांसारिक मोह-माया से उठकर भक्ति रस में डूबता है। शास्त्रों के अनुसार, जो मनुष्य हर वर्ष आने वाली दोनों पुत्रदा एकादशियों (पौष और श्रावण मास) का नियमपूर्वक पालन करता है, वह इस लोक में सभी सुखों का भोग करके अंत समय में विष्णु लोक (बैकुंठ) को प्राप्त करता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
वैष्णव श्रावण पुत्रदा एकादशी:
पुत्रदा एकादशी की पूजा विधि:
1. प्रातः काल के नियम और संकल्प
2. पूजा स्थल की तैयारी और स्थापना
3. भगवान विष्णु का पूर्ण पूजन
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अभिषेक व आचमन: सबसे पहले भगवान को गंगाजल से आचमन कराएं। तत्पश्चात पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का मिश्रण) से स्नान या अभिषेक कराएं और अंत में पुनः शुद्ध जल से स्नान कराकर वस्त्र पहनाएं।
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तिलक व श्रृंगार: भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को पीला चंदन, रोली, कुमकुम और अक्षत लगाएं।
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पुष्प व धूप-दीप: श्रीहरि को पीले रंग के फूल जैसे गेंदा या कनेर के पुष्प तथा पीले वस्त्र अर्पित करें। पूजा स्थल पर देसी घी का दीपक और सुगंधित धूपबत्ती जलाएं।
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तुलसी दल और नैवेद्य: भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी पत्र का होना अनिवार्य माना गया है। भगवान को पीले फल (जैसे केला, आम), मावे की मिठाई, पंजीरी या मखाने की खीर का भोग लगाएं और उस भोग में तुलसी दल अवश्य रखें। बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते।