जैन धर्म के धार्मिक कैलेंडर में पर्युषण महापर्व को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इसे सामान्य भाषा में ‘पर्वराज’ अर्थात् पर्वों का राजा कहा जाता है। यह कोई सांसारिक उत्सव या हर्षोल्लास का पर्व नहीं है, बल्कि आत्म-शुद्धि, त्याग, तपस्या, अहिंसा और क्षमाशीलता का एक महान आध्यात्मिक अनुष्ठान है। वर्ष 2026 में श्वेतांबर जैन परंपरा के अनुसार पर्युषण पर्व का शुभारंभ 8 सितंबर 2026 से हो रहा है। यह पावन समय अपनी आत्मा के निकट लौटने, सांसारिक विकारों को दूर करने और प्राणीमात्र के प्रति करुणा भाव जगाने का अनुपम अवसर है। जैन धर्म का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व पर्युषण पर्वारंभ इस वर्ष 8 सितंबर 2026 को हो रहा है। इसे जैन धर्म में ‘पर्वराज’ अर्थात् पर्वों का राजा कहा जाता है। ‘पर्युषण’ शब्द का अर्थ है आत्मा के निकट वास करना और अपनी अंतरात्मा को शुद्ध करना। यह पर्व बाह्य आडंबरों को त्यागकर आत्म-निरीक्षण, अहिंसा, क्षमाशीलता और आध्यात्मिक जागृति की ओर बढ़ने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है। श्वेतांबर समाज में यह पर्व आठ दिनों तक तथा दिगंबर परंपरा में यह ‘दशलक्षण पर्व’ के रूप में दस दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें प्रत्येक दिन जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों की साधना की जाती है।
पर्युषण पर्व के दिनों में जैन श्रद्धालु कठिन उपवास, स्वाध्याय, ध्यान और संयम का पालन करते हैं। श्वेतांबर परंपरा में इन आठ दिनों के दौरान कल्पसूत्र का वाचन और श्रवण किया जाता है, जिसमें तीर्थंकरों के जीवन और उनके उपदेशों का वर्णन होता है। लोग इस दौरान अपनी इच्छाओं और भौतिक सुखों पर नियंत्रण रखते हैं तथा रात्रि भोजन का त्याग करते हैं। मंदिरों में भगवान महावीर और तीर्थंकरों की विशेष पूजा-अर्चना, आरती और आध्यात्मिक प्रवचनों का आयोजन किया जाता है। यह समय सांसारिक मोह-माया को पीछे छोड़कर आत्म-कल्याण की दिशा में कदम बढ़ाने का होता है।
इस पावन महापर्व का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन संवत्सरी कहलाता है, जिसे ‘क्षमावाणी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सभी साधक जाने-अनजाने में मन, वचन और कर्म से हुई भूलों के लिए एक-दूसरे से “मिच्छामि दुक्कड़म” कहकर क्षमा मांगते हैं और मन के द्वेष तथा बैर भाव को पूरी तरह समाप्त करते हैं। पर्युषण पर्व हमें सिखाता है कि क्षमा मांगना और क्षमा करना ही मनुष्यता का सबसे बड़ा गुण है। 8 सितंबर 2026 से शुरू हो रहा यह पर्व आत्म-शुद्धि, शांति और प्राणीमात्र के प्रति दया भाव जगाने का एक सुनहरा अवसर है।
1. पर्युषण शब्द का अर्थ और दार्शनिक आधार
‘पर्युषण’ शब्द संस्कृत भाषा के दो शब्दों ‘परि’ (चारों ओर से) और ‘वसन’ या ‘उषण’ (निवास करना या पास रहना) से मिलकर बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है—”अपनी आत्मा के समीप निवास करना।”
सांसारिक जीवन में मनुष्य का मन निरंतर भौतिक सुख-सुविधाओं, धन-संपत्ति, राग-द्वेष और बाहरी दुनिया की भागदौड़ में उलझा रहता है। पर्युषण पर्व वह समय है जब साधक बाहरी दुनिया से अपना ध्यान हटाकर अंतरात्मा की ओर मोड़ता है। जैन दर्शन के अनुसार, आत्मा स्वभाव से शुद्ध, ज्ञानमयी और अनंत शक्ति संपन्न है, लेकिन कर्मों के आवरण के कारण वह संसार चक्र में फंसी हुई है। पर्युषण पर्व का मुख्य उद्देश्य तप, स्वाध्याय और संयम के माध्यम से इन्हीं कर्म-मल को छांटना और आत्मा को उसके मूल रूप में प्रकट करना है।
2. पर्युषण पर्व की अवधि और दो प्रमुख परंपराएं
जैन धर्म की दोनों प्रमुख शाखाओं “श्वेतांबर और दिगंबर” में पर्युषण पर्व मनाने की तिथियों और विधियों में थोड़ा अंतर होता है, परंतु दोनों का मूल संदेश एक ही है।
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श्वेतांबर परंपरा (8 दिवसीय पर्युषण): श्वेतांबर जैन समाज में पर्युषण पर्व 8 दिनों तक मनाया जाता है। वर्ष 2026 में इसकी शुरुआत 8 सितंबर से हो रही है। इन आठ दिनों में प्रतिदिन विशेष धार्मिक नियमों का पालन किया जाता है और अंतिम दिन ‘संवत्सरी’ के रूप में मनाया जाता है।
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दिगंबर परंपरा (10 दिवसीय दशलक्षण पर्व): दिगंबर जैन समाज में इसे ‘दशलक्षण धर्म’ या ‘दशलक्षण पर्व’ कहा जाता है, जो 10 दिनों तक चलता है। यह पर्व आमतौर पर श्वेतांबर पर्युषण समाप्त होने के बाद या भाद्रपद शुक्ल पंचमी से शुरू होता है। इसमें आत्मा के 10 उत्तम लक्षणों (उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य) की साधना की जाती है।
3. पर्युषण पर्व का इतिहास और चातुर्मास का संबंध
पर्युषण पर्व का सीधा संबंध जैन मुनियों के चातुर्मास (चार महीने का वर्षाकालीन प्रवास) से है। भगवान महावीर और जैन परंपरा के आचार्यों के नियमानुसार, वर्षा ऋतु में सूक्ष्म जीवों (कीड़े-मकोड़ों) की उत्पत्ति अत्यधिक बढ़ जाती है। अतः जीवों की रक्षा और अहिंसा के महाव्रत का पालन करने के लिए जैन साधु-साध्वी आषाढ़ पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक एक ही स्थान पर रुककर चातुर्मास करते हैं।
चातुर्मास के ठीक मध्य में, भाद्रपद मास में जब वर्षा का मौसम अपने चरम पर होता है, तब पर्युषण पर्व मनाया जाता है। इस समय गृहस्थ और साधु-संत दोनों ही अपने दैनिक व्यावहारिक कार्यों को सीमित करके पूर्ण रूप से भक्ति, ध्यान और धर्म आराधना में लीन हो जाते हैं।
4. पर्युषण के 8 दिनों की दैनिक साधना और कल्पसूत्र वाचन
श्वेतांबर परंपरा के 8 दिनों का प्रत्येक दिन आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है:
| पर्युषण का दिन |
धार्मिक गतिविधि और महत्व |
| पहला दिन |
अमारी प्रवर्तन (अहिंसा संकल्प), इंद्रियों पर नियंत्रण और स्वाध्याय की शुरुआत। |
| दूसरा दिन |
पोषध उपवास, आत्म-निरीक्षण और सांसारिक आरंभ-समारंभ का त्याग। |
| तीसरा दिन |
समाधि मरण और जीवन की नश्वरता का चिंतन, तपस्या का संकल्प। |
| चौथा दिन |
कल्पसूत्र का मूल वाचन प्रारंभ, तीर्थंकरों के चरित्र का स्मरण। |
| पांचवां दिन |
महावीर जन्म वाचन (जन्मोत्सव): कल्पसूत्र में भगवान महावीर के जन्म का प्रसंग पढ़ा जाता है, जिसे भक्त बड़े उल्लास से मनाते हैं। |
| छठा दिन |
भगवान महावीर के माता त्रिशला द्वारा देखे गए 14/16 स्वप्नों का वर्णन और उनकी व्याख्या। |
| सातवां दिन |
12 प्रकार के तप (वाह्य और अभ्यंतर) का चिंतन और आत्म-शुद्धि की गहन साधना। |
| आठवां दिन |
संवत्सरी महापर्व: पर्युषण का अंतिम और सबसे पवित्र दिन, क्षमा याचना का दिन। |
कल्पसूत्र का महत्व: पर्युषण पर्व के दौरान जैन साधु ‘कल्पसूत्र’ नामक पवित्र ग्रंथ का वाचन करते हैं। इसमें 24 तीर्थंकरों (विशेषकर भगवान पार्श्वनाथ और भगवान महावीर) के जीवन चरित्र, जैन आचार्यों की नामावली और जैन साधुओं के आचार-संहिता के नियमों का विशद वर्णन है। गृहस्थ भक्त प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर इसका श्रवण करते हैं।
5. पर्युषण में तप, संयम और खान-पान के कड़े नियम
पर्युषण पर्व के दिनों में शारीरिक और मानसिक शुद्धि के लिए कठोर नियमों का पालन किया जाता है:
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उपवास और तपस्या: साधक अपनी क्षमतानुसार विभिन्न प्रकार के तप करते हैं। इनमें ‘अठाई’ (8 दिनों तक लगातार जल के अलावा कुछ न खाना), ‘मासखमण’ (एक माह का उपवास), ‘एकासन’ (दिन में एक बार भोजन) और ‘आयांबिल’ (बिना नमक, तेल, घी और मिर्च-मसाले का सादा भोजन) प्रमुख हैं।
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रात्रि भोजन का पूर्ण त्याग: सूर्य अस्त होने के बाद जल ग्रहण करना भी वर्जित माना जाता है।
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हरी सब्जियों का त्याग: पर्युषण के दिनों में कंदमूल (आलू, प्याज, लहसुन) के साथ-साथ सभी प्रकार की ताजा हरी सब्जियों और फलों का त्याग किया जाता है, ताकि वनस्पति कायिक जीवों की हिंसा से बचा जा सके। केवल सूखा अनाज, दालें और सूखे मेवे ही उपयोग में लाए जाते हैं।
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अहिंसा का पालन: मन, वचन और कर्म—तीनों माध्यमों से किसी भी जीव को कष्ट न पहुंचाना इस पर्व की मूल आत्मा है।
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व्यवसाय और सुखों पर नियंत्रण: कई श्रद्धालु इन 8 दिनों में अपने व्यावसायिक कार्य बंद या सीमित कर देते हैं और पलंग, साबुन, चमड़े की वस्तुएं तथा सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग बंद कर देते हैं।
6. संवत्सरी और “मिच्छामि दुक्कड़म” का सार्वभौमिक संदेश
पर्युषण पर्व का अंतिम दिन संवत्सरी कहलाता है, जो इस पूरे अनुष्ठान का शिखर बिंदु है। संवत्सरी के दिन पूरे वर्ष भर में हुए पापों, भूलों और किसी के प्रति रखे गए द्वेष का परिमार्जन किया जाता है। इस दिन शाम के समय एक विशेष ‘संवत्सरी प्रतिक्रमण’ (अपनी गलतियों की समीक्षा और पश्चाताप की विधि) किया जाता है। प्रतिक्रमण समाप्त होने के बाद जैन धर्म का सबसे सुंदर और महान कृत्य संपन्न होता है; क्षमावाणी। इस अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार, मित्रों, परिचितों और शत्रुओं से भी हाथ जोड़कर और शीश झुकाकर क्षमा मांगता है। इसके लिए प्राकृत भाषा का ऐतिहासिक सूत्र बोला जाता है:
“खामेमि सब्व जीवे, सब्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सब्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणई॥”
अर्थ: “मैं विश्व के सभी जीवों से क्षमा मांगता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरी संसार के सभी प्राणियों से मित्रता है, मेरा किसी के साथ कोई बैर नहीं है।”
क्षमा मांगते समय “मिच्छामि दुक्कड़म” कहा जाता है, जिसका अर्थ है—”मेरे द्वारा जाने-अनजाने में मन, वचन या काया से आपको जो भी दुख पहुंचा हो, मेरे वे सभी दुष्कृत्य (गलतियां) मिथ्या यानी निष्फल हो जाएं।”
7. पर्युषण पर्व का आधुनिक समाज के लिए संदेश
आज के आपाधापी, तनाव, हिंसा और प्रतिस्पर्धा से भरे युग में पर्युषण पर्व का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाता है:
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मानसिक शांति और डिटॉक्स: पर्युषण केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक शुद्धि का माध्यम है। संयमित खान-पान और उपवास से शरीर का शोधन होता है, जबकि ध्यान और स्वाध्याय से तनाव दूर होता है।
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पर्यावरण और जीव संरक्षण: हरी सब्जियों और अनावश्यक संसाधनों का त्याग हमें पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की सीख देता है।
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अहंकार का विसर्जन: किसी से क्षमा मांगना और किसी को दिल से क्षमा कर देना मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार को पूरी तरह नष्ट कर देता है।
8 सितंबर 2026 से प्रारंभ हो रहा पर्युषण पर्व केवल जैन समाज का पर्व नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानवता को सत्य, अहिंसा, करुणा और भातृभाव का संदेश देने वाला शाश्वत पर्व है। यह हमें याद दिलाता है कि वास्तविक सुख बाहर की भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की पवित्रता और शांति में निहित है। पर्युषण पर्व के इस पावन अवसर पर आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलकर ही मानव जीवन सार्थक हो सकता है।