सोम प्रदोष व्रत का महत्व और पूजा विधि जानकर भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त करें

प्रदोष

सोम प्रदोष व्रत हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती की असीम कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत पावन और फलदायी उपवास माना जाता है। जब प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तो इसे ‘सोम प्रदोष व्रत’ कहा जाता है। सोमवार का दिन स्वयं महादेव और चंद्र देव को समर्पित है, इसलिए इस दिन त्रयोदशी का योग बनने से इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय का समय) में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। यह व्रत न केवल मानसिक शांति और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है, बल्कि जातक की कुंडली में चंद्रमा की स्थिति को भी मजबूत करता है। जो भक्त सोम प्रदोष के दिन पूरे विधि-विधान से व्रत रखकर शाम को शिवजी का अभिषेक करते हैं, उनके जीवन से भय, रोग और दरिद्रता दूर हो जाती है। 

सावन मास के कृष्ण पक्ष का सोम प्रदोष व्रत 10 अगस्त 2026, सोमवार को रखा जा रहा है। इस दिन सावन सोमवार और प्रदोष व्रत का दुर्लभ महासंयोग बन रहा है, जिससे इस दिन शिव पूजा का महत्व और फल दोनों ही कई गुना बढ़ जाते हैं। श्रावण कृष्ण त्रयोदशी तिथि 10 अगस्त को सुबह 08:00 बजे से शुरू होकर 11 अगस्त को प्रातः 04:54 बजे तक रहेगी। प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा शाम के समय ‘प्रदोष काल’ (सूर्यास्त के आसपास का समय) में ही की जाती है। 10 अगस्त को प्रदोष काल में पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त शाम 07:05 बजे से लेकर रात 09:14 बजे तक रहेगा। सोम प्रदोष व्रत का पारण अगले दिन यानी 11 अगस्त 2026 (मंगलवार) को सुबह सूर्योदय के बाद किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, त्रयोदशी तिथि के समापन के बाद या अगले दिन सुबह स्नान-ध्यान करके भगवान शिव की संक्षिप्त पूजा और आरती करें। तत्पश्चात, किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान-दक्षिणा देने के बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण कर अपना व्रत खोलें (पारण करें)।

सोम प्रदोष व्रत की पूजा विधि:

1. प्रातः काल की तैयारी और संकल्प

  • स्नान एवं ध्यान: सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें।
  • व्रत का संकल्प: भगवान शिव के समक्ष हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • दिनभर का नियम: दिनभर ‘ॐ नमः शिवाय’ का मानसिक जाप करते रहें और सात्विक दिनचर्या का पालन करें। फलहार या जलाहार ले सकते हैं।

2. शाम (प्रदोष काल) की मुख्य पूजा विधि

प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा सूर्यास्त के समय प्रदोष काल (सूर्यास्त से 45 मिनट पहले और 45 मिनट बाद) में की जाती है।

चरण 1: स्वच्छता और तैयारी

  • शाम को दोबारा स्नान करें या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • पूजा स्थल या घर के मंदिर को साफ करके उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुंह करके आसन पर बैठें।

चरण 2: शिवलिंग का अभिषेक

  • यदि घर में शिवलिंग है तो उन्हें किसी पात्र में रखें, या पास के शिव मंदिर जाएं।
  • सबसे पहले शिवलिंग पर शुद्ध जल और गंगाजल चढ़ाएं।
  • इसके बाद पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से शिवजी का रुद्राभिषेक करें।
  • अंत में पुनः शुद्ध जल से स्नान कराकर शिवलिंग को पोंछकर साफ करें।

चरण 3: सामग्री अर्पण

  • चंदन व भस्म: भगवान शिव को सफेद चंदन और भस्म का तिलक लगाएं।
  • बेलपत्र एवं धतूरा: 3, 5 या 11 बेलपत्र (बिना कटे-फटे, चिकनी सतह नीचे की ओर करके), धतूरा, भांग, और शमी के पत्ते अर्पित करें।
  • पुष्प व फल: आंकड़े के फूल (मंदार), सफेद फूल, मौसमी फल और जनेऊ अर्पित करें।
  • माता पार्वती की पूजा: शिवजी के साथ माता पार्वती को लाल चुनरी, सिंदूर और सुहाग की सामग्री चढ़ाएं।

चरण 4: दीप, धूप और कथा

  • शिवजी के समक्ष गाय के शुद्ध घी का दीपक और धूपबत्ती जलाएं।
  • हाथ में चावल और फूल लेकर सोम प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें।
  • कथा समाप्त होने के बाद हाथ में लिए चावल-फूल शिवलिंग पर अर्पित कर दें।

3. मंत्र और आरती

  • विशेष मंत्र जाप: पूजा के दौरान कम से कम 108 बार “ॐ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
  • आरती: अंत में कपूर जलाकर भगवान शिव और माता पार्वती की आरती उतारें।
  • क्षमा प्रार्थना: पूजा के अंत में भूल-चूक के लिए भगवान शिव से क्षमा मांगे।

4. प्रसाद वितरण और पारण

  • पूजा पूर्ण होने के बाद शिवजी को नैवेद्य (खीर, मिठाई या फल) का भोग लगाएं और इसे परिवार में प्रसाद के रूप में बांटें।
  • स्वयं फलाहार ग्रहण करें। व्रत का पारण अगले दिन सुबह सूर्योदय के बाद स्नान-पूजा करके ही करें

सोम प्रदोष व्रत की कथा:

पौराणिक काल में एक नगर में एक गरीब ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो चुका था, इसलिए वह अपने छोटे पुत्र के पालन-पोषण के लिए सुबह-शाम भिक्षा मांगने जाया करती थी। एक दिन भिक्षा मांगकर घर लौटते समय उसे रास्ते में एक घायल बालक मिला, जो विदर्भ देश का राजकुमार था। शत्रुओं ने उसके राज्य पर आक्रमण करके उसके पिता को बंदी बना लिया था और उसका राज्य हड़प लिया था। ब्राह्मणी को उस अनाथ और घायल बालक पर दया आ गई। वह उसे अपने घर ले आई और अपने पुत्र की तरह ही उसका पालन-पोषण करने लगी।

शांडिल्य ऋषि का उपदेश

कुछ समय बाद ब्राह्मणी दोनों बालकों को लेकर महर्षि शांडिल्य के आश्रम पहुंची। वहां उसने ऋषि से अपने और बालकों के कष्टों का निवारण पूछा। महर्षि शांडिल्य ने ब्राह्मणी को पूर्वजन्म के कर्मों का फल बताते हुए सोम प्रदोष व्रत की महिमा सुनाई और पूरे विधि-विधान से व्रत करने की सलाह दी। ऋषि की आज्ञा पाकर ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने नियमपूर्वक सोम प्रदोष का व्रत रखना शुरू किया और भगवान शिव की नियमित पूजा-अर्चना में लीन हो गए।

गंधर्व कन्या से विवाह और राज्य की प्राप्ति

एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे। वहां राजकुमार की भेंट ‘अंशुमती’ नाम की एक गंधर्व कन्या से हुई। अंशुमती राजकुमार के व्यवहार और सुंदरता से प्रभावित हो गई। अगले दिन अंशुमती अपने पिता (गंधर्व राज) को साथ लेकर आई और उसने राजकुमार से विवाह करने की इच्छा जताई। भगवान शिव की कृपा और सोम प्रदोष व्रत के प्रभाव से गंधर्व राज ने अपनी पुत्री का विवाह उस बेघर राजकुमार से कर दिया। इसके बाद गंधर्व राज ने राजकुमार को एक विशाल सेना दी। राजकुमार ने उस सेना की मदद से अपने शत्रु राजा पर आक्रमण किया और युद्ध जीतकर अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। राजकुमार ने राजा बनते ही उस गरीब ब्राह्मणी और उसके पुत्र को अपने राजमहल में सादर बुलाया और ब्राह्मणी के पुत्र को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। ब्राह्मणी के सोम प्रदोष व्रत और निष्ठापूर्वक की गई शिव पूजा के फलस्वरूप ही उसके और राजकुमार के सारे कष्ट समाप्त हो गए।
जो भी भक्त सोम प्रदोष के दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखता है और इस कथा को सुनता या पढ़ता है, महादेव उसके जीवन से दरिद्रता, रोग और संकट दूर करके उसे सुख, समृद्धि और मानसिक शांति प्रदान करते हैं।

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